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नहीं करूंगी ऐसा विज्ञापन...कहकर ठुकरा दिया ऑफर Actress Sai Pallavi turned down offer

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साउथ की फिल्मों की हीरोइन साई पल्लवी से एक क्रीम बनाने वाली नामी कंपनी अपनी क्रीम का विज्ञापन करने के लिए कहती हैं, लेकिन वह यह कहते हुए इंकार कर देती हैं कि इंसान की असली खूबसूरती तो वही रंग है जिसके साथ वह पैदा होता है। हम भारतीय हैं, हमारा रंग ऐसा ही है। करोड़ों रूपये का प्रस्ताव ठुकराने और ईमानदारी से अपनी बात कहते के लिए साई पल्लवी की जमकर तारीफ होती है, क्योंकि उन्होंने लोगों को भ्रमित करने पर भरोसा नहीं किया। उनकी बात ने फैंस का भी दिल जीत लिया। वास्तव में सच बोलने से जो दिलों में जगह मिलती है व झूठ बोलने से कभी नहीं मिलती। बाजारीकरण के दौर में ग्राहकों को भ्रमित करने का सिलसिला पुराना हो चला है। सिर्फ किसी हीरो हीरोइन के किसी प्रोडेक्ट दिखाने और उनके विश्वास जताने से प्रोडेक्ट अच्छा नहीं हो जाता, ग्राहक को अपने स्तर से पड़ताल जरूर कर लेनी चाहिए। विज्ञापनकर्ताओं की यह नैतिक जिम्मेदारी जरूर तय की जानी चाहिए कि लोगों को भ्रमित तो कम से कम न करें। #actress  @nitinsabrangi

टावर उड़ा दिए, लेकिन भ्रष्टाचारी आजाद क्यों है?

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कैसा समाज? आपदा में अवसर और मरती इंसानियत

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आपदा में मिलकर लड़ना चाहिए, लेकिन कथित सभ्य समाज में आपदा को अवसर बना दिया गया। कालाबाजारी, जमाखोरी, मनमानी, दलालों की सक्रियता इसका उदाहरण हैं। वैसे ऐसे लोगों को भी नहीं पता कि वह पैसा कमाकर जिंदा बच पाएंगे। समाज में दोनों ही तस्वीरें हैं एक साथ छोड़ने वालों की और दूसरी साथ देने वालों की। जब इंसानियत जवाब देने लगे तो हालात बदतर हो जाते हैं। पहली तस्वीर यूपी के कानपुर की है जहां एक बेटे ने बीमार मां को बाहर का रास्ता दिखा दिया। वह बेटी-दामाद के पास पहुंची, तो उन्होंने सड़क पर छोड़ दिया, दुर्भाग्य से महिला अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन अपने पीछे मरती इंसानित और संवेदनाओं की कहानी छोड़ गई है। दूसरी तस्वीर आगरा की है जहां एक महिला ने अपने पति की जान बचाने के लिए मुंह से सांस तक दी, लेकिन कोशिशें नाकाम रहीं। ऐसे डॉक्टर भी हैं जो जान पर खेलकर मरीजों का इलाज कर रहे हैं। वैसे प्रयास आपदा से लड़ने के निःस्वार्थ और सामूहिक होंगे, तो परिणाम भी सुखद होंगे। अपनी व अपने परिवार की हिफाजत सबसे ज्यादा खुद कीजिए। यह वक्त भी बीत जाएगा।

दादा नाना थे देशभक्त खुद बना डॉन Mukhtar Ansari Ki Kahani

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 यूपी के गाजीपुर में जन्मा मुख्तार अंसारी कभी एक साधारण लड़का हुआ करता था। उसकी क्रिकेट में खास रूची थी। जब वह बैट लेकर मैदान में उतरता था, तो साथ के लड़के तालियां बजाया करते थे और कहते थे कि वह एक दिन नामी क्रिकेटर बनेगा, लेकिन जिंदगी कब किसको किस मोड़ पर ले जाए, इस बात को कोई नहीं जानता। मुख्तार के साथ भी, कुछ ऐसा ही हुआ। बुरी संगत ने उसे बिगाड़ दिया। गलत राह शुरूआत सिनेमाहाल में टिकट ब्लैक करने से हुई। मुख्तार की कहानी में सामाजिक पहलू यह है कि यदि टाइम से सही दिशा की तरफ कदम बढ़ाए होते, तो आज वह इस रूप में नहीं होता। मुख्तार के दादा डॉ0 मुख्तार अहमद अंसारी, गांधीवादी विचारधारा के पक्के देशभक्त थे। वह जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के फाउंडरों में से एक फाउंडर थे। उनके नाना ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान अंसारी देश के लिए आगे रहे। उन्हें महावीर चक्र भी मिला। मुख्तार अंसारी का परिवार रईस रहा है। वह यदि छात्र जीवन से सही रहता, तो वह नामी क्रिकेट प्लेयर बन सकता था। Watch Full Story- https://youtu.be/w_RQs4d7Yy4

अफसर बनना चाहता है Amroha Wali shabnam Ka Beta

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मैं शबनम को बेटा हूं, लेकिन मेरी परवरिश जिनके पास हो रही है, अब वहीं मेरे माता-पिता हैं। वह मुझे, दिल-ओ-जान से भी ज्यादा प्यार करते हैं। उनके साये में, मेरी ख्वाहिशें अधूरी नहीं हैं। इस पूरी दुनिया में, मेरे लिए एक वही तो हैं, जिन्होंने इंसानियत के नाते, बड़े दिल वाला बनकर मुझे अपनाया है। हमारी छोटी सी दुनिया खुशियों से आबाद रहे।  वह बेटा कुछ ऐसा ही कहता है। शबनम की कहानी का यह इकलौता सामाजिक पहलू है कि एक दंपत्ति उस्मान और वंदना ने उसे गोद लिया। उसके दिल में उम्मीदें हैं, उसकी आंखों में बहुत सारे अधूरे सपने हैं, जिन्हें वह पूरा करना चाहता है। उस्मान और वंदना भी उसके सपनों को पंख दे रहे हैं, क्योंकि यह बेटा अफसर बनना चाहता है। इस बेटे से जब हम मिले, तो लगा कि वह अपनी उम्र से भी ज्यादा समझदार है। शबनम ने भी उसे एक बात समझाई थी, कि तुम पढ़ लिखकर एक दिन, ईमानदार और नेक इंसान बनना। समाज की भी यह जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वह कुछ ऐसा कतई न करे कि गुनाह करने वाली मां की कोख से जन्म लेने की कीमत किसी भी रूप में उसके बेटे को कतई न चुकानी पड़े। वह किसी भेदभव का शिकार न हो और उसकी परवरिश खूब बे...

मिस इंडिया रनरअप मान्या ने जीता लोगों का दिल Miss India runner-up Manya Singh won the hearts of the people

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एक मुकाम के बाद लोग समाज में बनावटी दिखावे के लिए, खुद को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं, लेकिन फेमिना मिस इंडिया 2020 की रनर अप का खिताब जीतने वाली मान्या सिंह ने, अपनी रियल लाइफ से, देश के लाखों लोगों का दिल जीत लिया। दरअसल उन्होंने अपने जज्बे और लग्न से खिताब जीता। इससे भी बड़ी बात यह कि वह अपने पिता के ऑटों में बैठकर ही मां के साथ सम्मान समारोह में पहुंची। उनके पिता आटो चलाते हैं, यह बात उन्होंने बिल्कुल नहीं छिपाई। मान्या ने अपने माता-पिता के पैर छुए और उन्हें गले भी लगाया। मान्या ने, यह संदेश दिया कि आपके हुनर के सामने सारा दिखावा छोटा पड़ जाता है और माता-पिता से बढ़कर कुछ नहीं होता। लोग मान्या के इस अंदाज के मुरीद हो गए। 

नेताओं का पाला हुआ गुंडा था विकास दुबे, पीछे की असल कहानी | Vikash Dubey Story

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यूपी के कानपुर में एक शातिर सफेदपोश हिस्ट्रीशीटर अपराधी दबिश डालने गए पुलिसकर्मियों पर मोर्चा लेकर ताबड़तोड़ फायरिंग करता है। इस शूटआउट में एक डीएसपी सहित 8 पुलिसकर्मी शहीद हो जाते हैं। आतंकी अंदाज में दिल दहला देने वाली घटना को अंजाम देने वाला विकास दुबे और उसके साथी फरार हो जाते हैं। पुलिस महकमे में हड़कंप मचता है, मुख्यमंत्री सख्त कार्रवाई के निर्देश देते हैं। पूरा कांड देश की मीडिया की सुर्खियां बनता है, राजनीतिक बयानबाजियां होती हैं। एनकाउंटर स्पेशलिस्ट पुलिस की 100 से भी ज्यादा टीमें, स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) की टीम और यूपी की सीमा से लगे राज्यों की पुलिस भी विकास की तलाश में जुट जाती हैं। इस बीच मुखबिरी व मिलीभगत करने वाले 1 एसओ व 1 चौकी इंचार्ज गिरफ्तार हो जाते हैं, 68 पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर भी कर दिया जाता है, एसटीएफ के एक अधिकारी को भी हटा दिया जाता है। इसके साथ ही 200 पुलिसकर्मी जांच के रडार पर होते हैं। फरार विकास दुबे के सिर पर 5 लाख का इनाम भी हो जाता है। सड़कों, चौराहों और हाईवे पर उसके पोस्टर लगा दिये जाते हैं बावजूद इसके पुलिस उसे 6 दिन तक भी नहीं खोज पाती। यह अपरा...

खादी और खाकी की शह से बड़ा हुआ शातिर खलनायक विकास दुबे

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उस रात जब पुलिस की गाड़ियां गांव के एक रास्ते पर जाकर रूकीं, तो उस वक्त पूरा गांव सन्नाटे और अंधेरे में डूबा हुआ था। कोई नहीं जानता था कि वहां क्या होने वाला है। हाथों में हथियार थामे पुलिसकर्मी थोड़ा आगे बढ़े कि तभी पूरा गांव गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंज उठा। पुलिसकर्मी बचाव करते हुए जवाबी फायरिंग कर रहे थे, लेकिन दूसरी तरफ से मोर्चा लेकर गोलियों की बौछार की जा रही थी। जिससे संभलना मुश्किल हो गया पुलिसकर्मी गोलियों का शिकार हो गए, बाकी ने छिपकर या भागकर जान बचाई। सुबह तक पता चला कि बदमाशों से हुई मुठभेड़ में 8 पुलिसवाले शहीद हो गए थे। इसके साथ ही वारदात पूरे देश की सुर्खियों में आ गया। यूपी के कानपुर के चौबेपुर थाने के बिकरू गांव को देश के लोग 8 पुलिसकर्मियों से शहादत से पहले शायद ही जानते होंगे, लेकिन अब इस गांव और जो घटना का प्रमुख खलनायक विकास दुबे को लोग जान चुके थे, दशकों तक घटनाक्रम को याद किया जाएगा जिसके किस्से भी होंगे। घटनाक्रम किसी फिल्म की स्क्रिप्ट से भी बड़ा था। यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि कोई अपराधी आखिर इतना बड़ा कैसे हो गया था कि वह इस तरह पुलिस से मोर्चा लेकर सीधे गोलियां दा...

क्यों हुआ बाबा की दवा और दावे पर विवाद, क्या सही हो सकते हैं मरीज? Baba Ramdev

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- बाबा रामदेव को उम्मीद थी कि उनकी दवा बाजार में आते ही धूम मचा देगी योग और गुस्से का कोई तालमेल नहीं होता, लेकिन बाबा रामदेव कोरोना काल में बनाई गई अपनी दवा को लेकर उपजे विवाद के बाद गुस्से में आ गए। हरिद्वार स्थित पतंजलि संस्थान में प्रेस वार्ता में बोल पड़े कि उनके खिलाफ ऐसे एफआईआर दर्ज करा दी गईं जैसे किसी आतंकवादी के खिलाफ एफआईआर होती हैं। बाबा को यह नहीं कहना पड़ता यदि उनकी दवा और दावे पर कोई सवाल नहीं उठाता, लेकिन विवाद ऐसा हुआ कि बात एफआईआर से लेकर हाईकोर्ट तक पहुंच गई। दरअसल बाबा रामदेव ने ‘दिव्या कोरोना किट’ लांच की। इस किट में तीन तरह की डिब्बियां शामिल थीं। उनका दावा था कि उनकी दवाओं के सेवन से कोरोना नहीं होगा। दावा यह भी था कि वह इसे कई लोगों पर आजमा चुके हैं। दावा पूरे जोश के साथ किया गया था लिहाजा मीडिया में भी जमकर प्रचार हुआ।           बाबा रामदेव को उम्मीद थी कि उनकी दवा बाजार में आते ही धूम मचा देगी। उनका प्रोडेक्ट कमाई के रिकार्ड तो तोड़ देगा। उन्होंने कहा भी था कि दवा सात दिनों में पतंजलि स्टोरर्स पर मिलेगी इसलिए उसके लिए हायतौबा न...

बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंहः दबाव और डिप्रेशन में गुम हुई प्रतिभा

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बॉलीवुड में अपनी काबिलियत से पहचान कायम करने वाले सुशांत सिंह राजपूत मामले में कई सवालों के जवाब खोजे जाते रहेंगे, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि एक प्रतिभावान कलाकार को आखिर ऐसा कदम ही क्यों उठाना पड़ा, जाहिर है कि वह डिप्रेशन के शिकार थे जो उनके लिए जानलेवा साबित हो गया। देखा जाए तो इस दौर में हर इंसान खुद से लड़ रहा है। बनावटी रिश्तें और अपनों से दूरियां समस्या को और भी बढ़ाने का काम करती हैं। खास बात यह थी कि इंजीनियरिंग के छात्र रहे सुशांत सिंह का बॉलीवुड में कोई गॉड फादर नहीं था। इसके बावजूद भी उन्होंने कई बेहतरीन फिल्में दीं और बॉलीवुड की दुनिया में अपनी मेहनत से ही अलग पहचान बनाई। वह अपने व्यवहार से लोगों को दिल जीत लेते थे। उनके लाखों चाहने वाले थे। उनके फैंस ने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन कोई बुरी खबर उन पर चोट पहुंचा देगी। वैसे ऐसा रास्ता कभी नहीं अपनाना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने वाले अपनों के लिए बहुत से गम छोड़ जाते हैं जिनकी भरपाई भी उम्र भर नहीं होती। जिंदगी यूं भी संघर्ष का दूसरा नाम है। https://youtu.be/z9CG4FYH3JY

कोरोना ने सफाई से जिंदगी जीना भी सिखाया है

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वैसे तो आपका और हमारा जीवन पहले से ही जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण से घिरा हुआ है, इसके निकलने के कोई खास प्रयास नहीं किये जाते, लेकिन अब कोरोना वायरस ने डर का माहौल पैदा कर दिया। हालांकि यह वक्ती है स्थायी कुछ भी नहीं। इस बहाने ट्रेनों के तकिए, कंबल, चादर, सीटें और रोडवेज बसें साफ हो जाएंगी। होटल-रेस्टोरेंट की टेबल-चेयर और मैन्यू कार्ड साफ हो जाएंगे। सार्वजनिक जगहों पर किन्हीं नेताजी के आने से पहले वाली सफाई दिखेगी। इंसानियत की दुहाई देने वाले सभ्य समाज में सबसे पहले लोग मुनाफा देखते हैं। चीजों को ब्लैक कैसे किया जाना है, रेट कैसे बढ़ाये जाने हैं वह अच्छी तरह से जानते हैं। पैसा चाहिए कैसे भी, किसी की जान की कीमत पर भी। इस तरह के विपरीत हालात होने पर ज्यादातर लोग बचने को घरों पर ही रहते हैं। हालात जैसे भी हों, लेकिन स्वास्थ्यकर्मी, मीडियाकर्मी और पुलिसकर्मी हर सूरत में अपना काम करते हैं। अपनी सेहत को सरकार या उसके विभागों के भरोसे कतई न रहने दें। सबसे पहले बेवजह के डर और अफवाहों से बचें, खुद डॉक्टर न बनें और साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखें फिर कोरोना हो या अन्य कोई खानदानी वायरस आपस...

परिवार के झगड़े पड़ रहे हैं जिंदगी पर भारी, बढ़ते सुसाइड केस

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परिवार के झगड़े जिंदगी पर भारी पड़ रहे हैं। यूपी में एक युवा आईपीएस ने जहर खाया। वह जिंदगी की जंग हार गया। पत्नी ने जमाष्टमी पर भी नॉनवेज मंगाकर खाया जबकि पति को यह पसंद नहीं था। एक साधारण परिवार का लड़का विधवा श्माँश् को अपने पास रखना चाहता था। अपनी उन बहनों व भाई के लिए भी कुछ करना चाहता था जिन्होंने उसे इस मुकाम पर पहुंचायाए लेकिन डॉक्टर पत्नी ऐसा नहीं चाहती थी। पत्नी को ससुराल पसंद नहीं था। एक माँ अपने बेटे की आवाज सुनने को तरसती थी। एकण्एक पैसा जोड़कर उन्होंने उसे पढ़ाया था। श्स्टेटसश् की रेखा दीवार बनी थी। होनहार बेटा सुरेंद्र कुमार दास बुरी तरह टूट गया। यह किसी एक परिवार या व्यक्ति का किस्सा नहीं है। हर पल किसी न किसी परिवार में यह सब चल रहा होता है। समाज में लोगों की यह प्रवृत्ति बन गई है कि उन्हें शादी के लिए लड़का तो अच्छा चाहिएए लेकिन वह उन अपनो से रिश्ता न रखे जिन्होंने उसे पैदा कियाएपढ़ाण्लिखाकर किसी काबिल बनाया। लड़का इकलौता होए तो नजरें ज्यादा ठहरती हैं। लड़का बुरी तरह से पिसता है। मुकदमे में फंसाने की धमकिया अलग होती हैं। अकेले बुजुर्गों की तादाद बढ़ रही है। घरों ...

पाखंडी गुरमीत और उसका गुडातंत्र, कानून की चोट से ध्वस्त वजूद

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कथित बाबा के तौर पर खुद को पेश करने वाले गुरमीत सिंह को माननीय अदालत द्वारा दोषी ठहराये जाने के बाद प्रमुख रूप से पंजाब व हरियाणा में हुई खूनी हिंसा ने न सिर्फ सरकारी तंत्र की पोल खोली बल्कि पहले की तरह एक बार फिर साफ हो गया कि इस तरह के पाखंडियों से लगाव रखने वाला अंधश्रृद्वा वाला भीड़तंत्र समाज के लिए किस तरह खतरा साबित होता हैं। मनमानी और खुद को कानून से ऊपर समझने के गुरूर ने राम रहीम को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। इस सबके बीच करोड़ों रूपये की सरकारी गैरसरकारी संपत्ति का नुकसान तो हुआ ही लोगों की जानें भी गईं। जिंदगी ठहर सी गई, बस व रेल मार्ग अवरूद्व हो गए, लोग बिजली पानी से महरूम हुए, स्कूल कॉलेज बंद हुए और तमाम परेशानियों से इसलिए रूबरू होना पड़ा, क्योंकि भीड़तंत्र ने कुछ समय के लिए व्यवस्था को अपाहिज कर दिया। बावजूद इसके तारीफ करनी होगी उस दुराचार पीड़िता की जिसने अकूत दौलत व ताकत के बाजीगर के खिलाफ इंसाफ की अवाज बुलंद की। इसके लिए उसे तमाम धमकियों और दुश्वारियों का सामना करना पड़ा। अदालत के फैसले ने इंसाफ के प्रति आम आदमी के विश्वास को और भी मजबूत किया और न्यायाधीश ने भीड़ के दम प...

चोटीकटवा, मंकी मैन और मुंहनुचवा, क्या होती है हकीकत?

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देश के चार राज्यों में एक अफवाह चोटीकटवा ने आतंक की तरह काम किया। महिला ओं व लड़कियों के चोटी कटने के मामले तेजी से सामने आये। यह चोटी काटता कौन है? यह रहस्य है, लेकिन इसने सभी के होश उड़ा दिए। अफवाह ने खतरनाक रूप लिया और उन्माद फैलने लगा। आगरा में लोगों ने एक महिला को डायन बताकर लाठी डंडों से पीटकर मार डाला। यह समाज को कलंकित करती घटना है। दरअसल शहरी व देहात इलाकों में महिलाओं व लड़कियों की चोटी काटने के मामले प्रकाश में आये। कटी चोटियां हाथ में होती हैं इसलिए घटनाओं को पूरी तरह झुठलाया भी नहीं जा सकता। चोटी कटने के पीछे तरह-तरह के दावे और अफवाहें हैं। हैरत भरे किस्से रहस्य से परिपूर्ण और रोमांचक जरूर हैं। वैज्ञानिक इसे अंधविश्वास और मनोविज्ञानी बीमारी बताते हैं। असामाजिक तत्वों की करतूत भी इसे बताया जा रहा है। पुलिस कुछ कहने की स्थिति में नहीं है। इससे पहले वर्ष 2001 में मंकीमैन ने खूब दहशरत फैलाई। इसके बाद मुंहनोचवा आ गया। हैरानी की बात यह है कि किसी का भी कभी ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आया। समय के साथ ऐसी घटनाएं और किस्से थम जाते हैं। अफवाहें कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बन जाती हैं।...

निर्भया केस समाज को भी सबक जरूरी

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-देवकी शर्मा देश के बहुचर्चित व वीभत्स निर्भया दुराचार कांड में 5 मई, 2017 को सर्वाेच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट के बाहुबली फैसले के साथ बेटी के दर्द को बेहद करीब से महसूस करने वाले पीड़िता के उन माता पिता की भी तारीफ होनी चाहिए जो इंसाफ की आस में टकटकी लगाये हौंसले व हिम्मत से दुश्वारियों के बीच डटे रहे। तीन जजों की बेंच जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस भानुमति और जस्टिस अशोक भूषण ने घृणित अपराध को न सिर्फ सदमे की सुनामी बताया. बल्कि कहां की इस मामले में कोई रियायत नहीं दी जा सकती। जिस तरह से अपराध हुआ है वह एक अलग दुनिया की कहानी लगती है।  जो कुछ निर्भया के साथ हुआ वह किसी सभ्य समाज की हकीकत, तो नहीं था। यकीनन ऐसे फैसलों से बेटियों को शिकार बनाने वाले हैवानों में डर पैदा होगा. बलात्कार, छेड़छाड़, यौन उत्पीड़न, महिला अत्याचार, लिंगभेद या फिर यौन शोषण चाहे जो नाम दीजिए महिलाओं व लड़कियों को ही इसका सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति हर किसी के लिए चिंताजनक है। बड़ा सवाल भी है कि ऐसे लोगों को तब अपनी मां, बहन और बेटी का ख्याल क्यों नहीं आता, जब वह किसी को अपनी हवस का शिकार बना रहे होते हैं। ...

शक्तिमान तो देवभूमि से चला गया, अपने पीछे सवाल छोड़ गया

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शक्तिमान! तुम्हारा जाना बहुत दुःख दे रहा है। मैंने अभी तक देवभूमि के जो मामले लिखे वह ऐसे अपराध थे जो इंसानों ने इस दूसरे के खिलाफ किए थे। उनमें वह चीखे थे, चिल्लाये थे, बयान दिए थे। पुलिस के रोजनामचे और विवेचनाओं ने बहुत कुछ बयां किया था, लेकिन तुम्हारा दर्द उन सबसे बड़ा है इसलिए बयां करना मुश्किल है। तुम एक सियासतदान की कथित बहादुरी और गंदी राजनीति का शिकार हो गए। न चीख सके, न चिल्ला सके, न बचाव कर सके न कोई वार। क्योंकि तुम्हें तो इसकी बाजीगरी ही नहीं आती थी। तुमने तो पुलिस की ट्रेनिंग में वफादारी और हुनर सीखा था। तुम्हें सिखाया ही नहीं गया था कि कोई इंसान यदि जानवर बन जाए, तो उससे किस तरह पेश आया जाए। कोढ़ग्रस्त इंसानियत पर तुम हैरान थे। तुम्हारा बेजुबान होना जान पर बन आया। तुम्हारे साथ सब सरेआम हुआ था। कोई वारदात यूं होती तो तस्वीर दूसरी होती परन्तु तुम्हारे मामले में कानून का लचीलापन था। 13 मार्च से अब तक तुमने बहुत दर्द सहा। हम सिर्फ उस तड़प को महसूस ही कर सके। तुम्हें बचाने की हर संभव कोशिशें कीं, जिंदगी सलामत रहे इसलिए न चाहते हुए भी तुम्हारे पैर को भी जिस्म से जुदा करना मज...

'मैं आतंकवादी नहीं: संजय दत्त'

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यरवडा जेल से रिहा हुए फ़िल्म अभिनेता संजय दत्त ने मीडिया से आग्रह किया है कि ष्मैं आतंकवादी नहीं हूं अब 1993 के धमाकों से मुझे नहीं जोड़ेंण्ष् अवैध हथियार रखने के दोषी पाए गए 56 साल के संजय दत्त मई 2013 से जेल में थे जहां वह 42 महीने रहेण् 2007.08 के बीच उन्होंने जेल में 18 महीने बिताए थेण् साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल कोर्ट के उस आदेश पर मुहर लगाई थी जिसमें उन्हें कुल पांच साल की क़ैद सुनाई गई थीण् यरवडा जेल से बाहर निकलकर ज़मीन को चूमने और तिरंगे को सलाम करने पर उन्होंने कहाए ष्ये धरती मेरी मां हैए मैं हिंदुस्तान की धरती को प्यार करता हूं और मुझे भारतीय होने पर गर्व हैए इसीलिए मैंने अपनी सज़ा काटीण्ष् संजय दत्त ने कहा कि 23 साल से वे जिस आज़ादी के लिए तरस रहे थे वो आज उन्हें मिल गई हैण् उन्होंने कहा कि आज के दिन वो सबसे अधिक अपने पिता सुनील दत्त को श्मिसश् कर रहे हैंण्

आरक्षण के लिए क्या यह भी जरूरी है? देश तो अपना ही होता है

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-पिछले दिनों पूरा हरियाणा जाट आरक्षण की आग में धधकता नजर आया। वह सब हुआ जो कल्पनाओं से थोड़ा अलग था। सड़कों से लेकर रेल पटरियों तक पर लोग उतरे थे। कई बसों, कारों अन्य वाहनों, दुकानों, शोरूम, कारखानों, थाने, पुलिस चौकियों, पैट्रोल पम्पों, स्कूलों तक को आग के हवाले कर दिया गया। सैंकड़ों लोग बेरोजगार हो गए। हर तरफ दहशत का आलम था, खौफ था और जिंदगियों का डर भी। जमकर लूटपाट भी हुई। स्कूल कालेज बंद कर दिए गए। जब यह सब हुआ तब कानून के पहरेदार तमाशा देखकर कांप रहे थे। अराजगता के इस तांडव में जिनकी दुकानें प्रतिष्ठान बच गए वह खुद को खुशनसीब किन्तु डरा हुआ मान रहे हैं। हालात इस कदर बिगड़े कि सरहदों पर रक्षा करने वाली सेना को मोर्चा संभालने के लिए बुलाना पड़ा। हालात सामान्य हुए हैं, लेकिन अपने पीछे ढेरों सवाल और दर्द छोड़ रहे हैं। जिनके जवाब वक्त की गर्त में खो जाएंगे। आरक्षण की मांग के नाम पर चले आंदोलन में अरबों की संपत्ति खाक, दहशत, खौफ, अराजगता और कानून के तमाशे के बीच हरियाणा आरक्षण की आग में वर्षों पीछे चला गया है। बात आरक्षण के पक्ष या विपक्ष की नहीं सवाल यह कि लूटपाट, हिंसा करने वाले, स्टे...

इंद्राणी मुखर्जीः अपने ही बुने जाल में फंस गई शातिर औरत

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अर्श से फर्श पर गिरकर कैसी तड़प होती है? इस हकीकत को सलाखों के पीछे अपने ही बुने जाल में फंसी इंद्राणी से बेहतर शायद ही कोई दूसरा बता पाए। जेल की जिंदगी उसे कांटे की तरह चुभ रही है और वह बाहर निकलने के लिए छटपटा रही है। इंद्राणी मुखर्जी कभी गुवाहटी की एक मामूली लड़की हुआ करती थी। वह आधुनिकता की अंधी दौड़ में शरीक होने का ख्वाब देखती थी। ऐसे ही ख्वाब ने उसे अति महत्वाकांक्षी बना दिया। उसने नारी सीमाओं को ताक पर रखा ओर रिश्तों के अजीब जाल में उलझती चली गई। उसकी किस्मत के सितारे बुलन्दी पर पहुंचे, तो एक दिन इंद्राणी मीडिया जगत की नामी हस्ती बन चुकी थी। दौलत उसके कदम चूमती थी ओर वह दुनिया की 50 पावरफुल महिलाओ की सूची में शामिल थी। शोहरत व दौलत के शिखर पहुंचकर संतुलन बनाए रखना हर किसी के वश में नहीं होता। इंद्राणी पर भी दौलत व शोहरत का ऐसा नशा हावी हुआ कि वह सुधुबुध खो बैठी। उसने एक बड़ा गुनाह करके राज को ही दफन कर दिया, लेकिन राजदार रहा शख्स उसका ड्राइवर श्यामराय हथियार तस्करी मामले में पुलिस पकड़ा गया, तो उसने ऐ सा राजफाश किया जिसने पूरे देश में तहलका मचा दिया। मुंबई की खार पुलिस ने इ...

अफशां एक खतरनाक औरत, जवान लड़कों को फंसाती से जाल में

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नामः अफशां जबीन उर्फ निकी जोसेफए उम्ररू 37 साल। गुनाहः आतंकी संगठन में भर्ती के लिए युवकों को उकसाना।  अंजामः जेल की सलाखों के पीछे। जी हा! फोटो में दिख रही इस महिला का प्रोफाईल कुछ ऐसा ही है। आइएस की पहली भारतीय एजेंट खतरनाक इरादों की वारिस अफशां फेसबुक के जरिए नौजवान युवकों को फंसाने का जाल बिछाती थी ओर उन्हें सीरिया ओर इराक में जड़े जमा चुके खूंखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ;आइएस के लिए जिहादी बनाकर भर्ती कराती थी। वह न सिर्फ ऑनला इन भर्ती कर रही थी बल्कि आइएस के खूंखार इरादों ओर कारनामों का प्रचार भी करती थी। झूठे ढंग से खुद को ब्रिटिश नागरिक बताने वाली अफशां हैदराबाद की रहने वाली थी। उसने इंटर आबूधाबी से किया ओर पुनः इंडिया आ गई। बाकी पढ़ायी कर वह यूएई चली गई। दुबई भी उसका ठिकाना था। अफशां खुफिया एजेंसियों के रडार पर तब आयी जब आतंकी संगठन के लिए काम करने वाले अमेरिका से आए एक इंजीनियर सलमान को हैदराबाद एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया गया। उसने ही अफशां के कारनामें बताये। उसे संयुक्त अरब अमीरात से प्रत्यर्पित कर गिरफ्तार किया गया। इन्वेस्टीगेशन एजेंसीज की पूछताछ के बाद यह महिल...