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शक्तिमान तो देवभूमि से चला गया, अपने पीछे सवाल छोड़ गया

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शक्तिमान! तुम्हारा जाना बहुत दुःख दे रहा है। मैंने अभी तक देवभूमि के जो मामले लिखे वह ऐसे अपराध थे जो इंसानों ने इस दूसरे के खिलाफ किए थे। उनमें वह चीखे थे, चिल्लाये थे, बयान दिए थे। पुलिस के रोजनामचे और विवेचनाओं ने बहुत कुछ बयां किया था, लेकिन तुम्हारा दर्द उन सबसे बड़ा है इसलिए बयां करना मुश्किल है। तुम एक सियासतदान की कथित बहादुरी और गंदी राजनीति का शिकार हो गए। न चीख सके, न चिल्ला सके, न बचाव कर सके न कोई वार। क्योंकि तुम्हें तो इसकी बाजीगरी ही नहीं आती थी। तुमने तो पुलिस की ट्रेनिंग में वफादारी और हुनर सीखा था। तुम्हें सिखाया ही नहीं गया था कि कोई इंसान यदि जानवर बन जाए, तो उससे किस तरह पेश आया जाए। कोढ़ग्रस्त इंसानियत पर तुम हैरान थे। तुम्हारा बेजुबान होना जान पर बन आया। तुम्हारे साथ सब सरेआम हुआ था। कोई वारदात यूं होती तो तस्वीर दूसरी होती परन्तु तुम्हारे मामले में कानून का लचीलापन था। 13 मार्च से अब तक तुमने बहुत दर्द सहा। हम सिर्फ उस तड़प को महसूस ही कर सके। तुम्हें बचाने की हर संभव कोशिशें कीं, जिंदगी सलामत रहे इसलिए न चाहते हुए भी तुम्हारे पैर को भी जिस्म से जुदा करना मज...

हुजूर! 42 कत्ल के कातिल भी तो होंगे?

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- पीड़ितों के दर्द पर जमकर होती रही सियासत। - हाशिमपुरा कांड में 28 साल बाद आया फैसला। -नितिन शर्मा ‘सबरंगी’ 1987 में मेरठ दंगे के दौरान हुए बहुचर्चित हाशिमपुरा कांड में 42 लोगों की मौत पर दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने सबसे पुराने पेंडिंग केस में फैसला देकर सभी 16 आरोपियों को बरी कर दिया। 3 आरोपियों की मौत फैसले से पहले ही हो गई। फैसला हैरानी व नाखुशी दे रहा है। अदालत के दहलीज के बाहर यह हैरानी जरूरी भी है क्योंकि मानवता को शर्मसार करने वाले कांड में 28 साल बाद आये फैसले में भी कोई दोषी नहीं मिला। सरकारी तंत्र  ओर पैरवी के नकारेपन का इससे बड़ा सुबूत भला ओर क्या होगा। सवाल यह कि कत्ल हुए तो कातिल भी तो होंगे, लेकिन अदालती फैसले सुबूतों ओर गवाहों  की रोशनी में आते हैं। कानून भावनाओं से नहीं चलता वरना मौत का मंजर देखने वाली आँखों में इंसाफ की तड़प जरूरी दिखती। मांओं ओर बेवाओं का दर्द भी दिखता। रोजी-रोटी का संकट, घर के चिरागों के बुझने से हुआ अंधेरा ओर दुआओं में सिर्फ इंसाफ मांगते बूढे माँ-बाप दिखते। हाँ राजनीति के बाजीगर ऐसे दर्द को वोटों के मुनाफे के लिए वक्त-वक्त पर जरूर ...
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काली कमाई का बड़ा कुबेर -इंजीनियर की दौलत से हर कोई हैरान  -20 साल में बनाया करोड़ों का साम्राज्य यादव सिंह व उसकी आलीशान कोठी। -नितिन शर्मा ‘सबरंगी’  नोएडा, ग्रेटर नोएडा व यमुना प्राधिकरण के सस्पेंड हो चुके चीफ इंजीनियर यादव सिंह का नाम आयकर के शिकंजे में आने के बाद अचानक राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गया। यह सुर्खियां उसे करोड़ों की काली कमाई की कलयुगी बाजीगरी के चलते मिली। आगरा के एक छोटे से गांव निकलकर वर्ष 1980 में अपनी नौकरी शुरू करने वाला मामूली इंजीनियर इतना बड़ा धनपति बन गया कि उसने कमाई के मामलों में बड़े-बड़ों को पछाड़ दिया। कुछ सालों में उसने देश-विदेश में इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर दिया कि हर कोई हैरानी से उसकी चर्चा करता है। राजनीति को सुरक्षा कवच बनाकर उसने बेशुमार दौलत कमायी। उसके जानकार बताते हैं कि वह सभी काम दौलत के तराजू में ही तौलता था। उसे शोहरत नहीं बल्कि दौलत व रसूख से लगाव था। करोड़ों रूपये उसकी कारों, घरों व लॉकरों में पड़े रहते थे। उसने इतना माल बटोरा कि खुद भी ठीक से संभाल नहीं पा रहा था। काली कमाई की ऐसी दिवानगी अक्सर यादव सिंह जैसे लोगों ...
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न भरने वाले जख्म ओर जिम्मेदार कोई नहीं? सियासत की गंदी शतरंज पर हमदर्दी का तमाशा सदियों पुराने रिश्तें नफरत के खंजर से घायल छेड़छाड़ की एक घटना के बाद उत्तर प्रदेश के जनपद मुजफ्फरनगर में साम्प्रदायिक दंगा हो गया। 3 दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए। बहुत से घायल हुए। -‘तकलीफ तब होती है जब इंसानियत नफरतों के खंजर से घायल होती है।’ सामाजिक धरातल चटका, सदियों पुराने रिश्ते, अमन, इंसानियत घायल हुई, करोड़ों का नुकसान हुआ, शहर पर बदनुमा दाग लगा ओर सौहार्द बिगड़ गया। हिंसा की चिंगारी ने उन गावों तक को अपनी चपेट में ले लिया जिनमें भाईचारे की मिसाल दी जाती थी। 11 दिनों तक महौल को समझने की प्रशासनिक नाकामी के बीच हिंसा भड़की, तो सीमा पर रक्षा करने वाली सेना को लगाना पड़ा। यह दुर्भाग्य ही है जो सैनिक सीमा पर रक्षा करते हैं उन्हें हमारी निजी व्यवस्था भी संभालनी पड़ती है जाहिर है यह हमारी नाकामी का सुबूत भी है। जाति-धर्म के नाम पर खूनी साजिश में हर सूरत में नुकसान आम आदमी का ही होता है। ऐसे दंगों से लोगों को कुछ हासिल नहीं होता। शायद यह बात बहुत कुछ गंवाने के बाद समझ में आ भी जाती है। नापाक त...