कैसा समाज? आपदा में अवसर और मरती इंसानियत

आपदा में मिलकर लड़ना चाहिए, लेकिन कथित सभ्य समाज में आपदा को अवसर बना दिया गया। कालाबाजारी,


जमाखोरी, मनमानी, दलालों की सक्रियता इसका उदाहरण हैं। वैसे ऐसे लोगों को भी नहीं पता कि वह पैसा कमाकर जिंदा बच पाएंगे। समाज में दोनों ही तस्वीरें हैं एक साथ छोड़ने वालों की और दूसरी साथ देने वालों की। जब इंसानियत जवाब देने लगे तो हालात बदतर हो जाते हैं। पहली तस्वीर यूपी के कानपुर की है जहां एक बेटे ने बीमार मां को बाहर का रास्ता दिखा दिया। वह बेटी-दामाद के पास पहुंची, तो उन्होंने सड़क पर छोड़ दिया, दुर्भाग्य से महिला अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन अपने पीछे मरती इंसानित और संवेदनाओं की कहानी छोड़ गई है। दूसरी तस्वीर आगरा की है जहां एक महिला ने अपने पति की जान बचाने के लिए मुंह से सांस तक दी, लेकिन कोशिशें नाकाम रहीं। ऐसे डॉक्टर भी हैं जो जान पर खेलकर मरीजों का इलाज कर रहे हैं। वैसे प्रयास आपदा से लड़ने के निःस्वार्थ और सामूहिक होंगे, तो परिणाम भी सुखद होंगे। अपनी व अपने परिवार की हिफाजत सबसे ज्यादा खुद कीजिए। यह वक्त भी बीत जाएगा।

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