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कोरोना ने सफाई से जिंदगी जीना भी सिखाया है

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वैसे तो आपका और हमारा जीवन पहले से ही जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण से घिरा हुआ है, इसके निकलने के कोई खास प्रयास नहीं किये जाते, लेकिन अब कोरोना वायरस ने डर का माहौल पैदा कर दिया। हालांकि यह वक्ती है स्थायी कुछ भी नहीं। इस बहाने ट्रेनों के तकिए, कंबल, चादर, सीटें और रोडवेज बसें साफ हो जाएंगी। होटल-रेस्टोरेंट की टेबल-चेयर और मैन्यू कार्ड साफ हो जाएंगे। सार्वजनिक जगहों पर किन्हीं नेताजी के आने से पहले वाली सफाई दिखेगी। इंसानियत की दुहाई देने वाले सभ्य समाज में सबसे पहले लोग मुनाफा देखते हैं। चीजों को ब्लैक कैसे किया जाना है, रेट कैसे बढ़ाये जाने हैं वह अच्छी तरह से जानते हैं। पैसा चाहिए कैसे भी, किसी की जान की कीमत पर भी। इस तरह के विपरीत हालात होने पर ज्यादातर लोग बचने को घरों पर ही रहते हैं। हालात जैसे भी हों, लेकिन स्वास्थ्यकर्मी, मीडियाकर्मी और पुलिसकर्मी हर सूरत में अपना काम करते हैं। अपनी सेहत को सरकार या उसके विभागों के भरोसे कतई न रहने दें। सबसे पहले बेवजह के डर और अफवाहों से बचें, खुद डॉक्टर न बनें और साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखें फिर कोरोना हो या अन्य कोई खानदानी वायरस आपस...

परिवार के झगड़े पड़ रहे हैं जिंदगी पर भारी, बढ़ते सुसाइड केस

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परिवार के झगड़े जिंदगी पर भारी पड़ रहे हैं। यूपी में एक युवा आईपीएस ने जहर खाया। वह जिंदगी की जंग हार गया। पत्नी ने जमाष्टमी पर भी नॉनवेज मंगाकर खाया जबकि पति को यह पसंद नहीं था। एक साधारण परिवार का लड़का विधवा श्माँश् को अपने पास रखना चाहता था। अपनी उन बहनों व भाई के लिए भी कुछ करना चाहता था जिन्होंने उसे इस मुकाम पर पहुंचायाए लेकिन डॉक्टर पत्नी ऐसा नहीं चाहती थी। पत्नी को ससुराल पसंद नहीं था। एक माँ अपने बेटे की आवाज सुनने को तरसती थी। एकण्एक पैसा जोड़कर उन्होंने उसे पढ़ाया था। श्स्टेटसश् की रेखा दीवार बनी थी। होनहार बेटा सुरेंद्र कुमार दास बुरी तरह टूट गया। यह किसी एक परिवार या व्यक्ति का किस्सा नहीं है। हर पल किसी न किसी परिवार में यह सब चल रहा होता है। समाज में लोगों की यह प्रवृत्ति बन गई है कि उन्हें शादी के लिए लड़का तो अच्छा चाहिएए लेकिन वह उन अपनो से रिश्ता न रखे जिन्होंने उसे पैदा कियाएपढ़ाण्लिखाकर किसी काबिल बनाया। लड़का इकलौता होए तो नजरें ज्यादा ठहरती हैं। लड़का बुरी तरह से पिसता है। मुकदमे में फंसाने की धमकिया अलग होती हैं। अकेले बुजुर्गों की तादाद बढ़ रही है। घरों ...

पाखंडी गुरमीत और उसका गुडातंत्र, कानून की चोट से ध्वस्त वजूद

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कथित बाबा के तौर पर खुद को पेश करने वाले गुरमीत सिंह को माननीय अदालत द्वारा दोषी ठहराये जाने के बाद प्रमुख रूप से पंजाब व हरियाणा में हुई खूनी हिंसा ने न सिर्फ सरकारी तंत्र की पोल खोली बल्कि पहले की तरह एक बार फिर साफ हो गया कि इस तरह के पाखंडियों से लगाव रखने वाला अंधश्रृद्वा वाला भीड़तंत्र समाज के लिए किस तरह खतरा साबित होता हैं। मनमानी और खुद को कानून से ऊपर समझने के गुरूर ने राम रहीम को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। इस सबके बीच करोड़ों रूपये की सरकारी गैरसरकारी संपत्ति का नुकसान तो हुआ ही लोगों की जानें भी गईं। जिंदगी ठहर सी गई, बस व रेल मार्ग अवरूद्व हो गए, लोग बिजली पानी से महरूम हुए, स्कूल कॉलेज बंद हुए और तमाम परेशानियों से इसलिए रूबरू होना पड़ा, क्योंकि भीड़तंत्र ने कुछ समय के लिए व्यवस्था को अपाहिज कर दिया। बावजूद इसके तारीफ करनी होगी उस दुराचार पीड़िता की जिसने अकूत दौलत व ताकत के बाजीगर के खिलाफ इंसाफ की अवाज बुलंद की। इसके लिए उसे तमाम धमकियों और दुश्वारियों का सामना करना पड़ा। अदालत के फैसले ने इंसाफ के प्रति आम आदमी के विश्वास को और भी मजबूत किया और न्यायाधीश ने भीड़ के दम प...

चोटीकटवा, मंकी मैन और मुंहनुचवा, क्या होती है हकीकत?

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देश के चार राज्यों में एक अफवाह चोटीकटवा ने आतंक की तरह काम किया। महिला ओं व लड़कियों के चोटी कटने के मामले तेजी से सामने आये। यह चोटी काटता कौन है? यह रहस्य है, लेकिन इसने सभी के होश उड़ा दिए। अफवाह ने खतरनाक रूप लिया और उन्माद फैलने लगा। आगरा में लोगों ने एक महिला को डायन बताकर लाठी डंडों से पीटकर मार डाला। यह समाज को कलंकित करती घटना है। दरअसल शहरी व देहात इलाकों में महिलाओं व लड़कियों की चोटी काटने के मामले प्रकाश में आये। कटी चोटियां हाथ में होती हैं इसलिए घटनाओं को पूरी तरह झुठलाया भी नहीं जा सकता। चोटी कटने के पीछे तरह-तरह के दावे और अफवाहें हैं। हैरत भरे किस्से रहस्य से परिपूर्ण और रोमांचक जरूर हैं। वैज्ञानिक इसे अंधविश्वास और मनोविज्ञानी बीमारी बताते हैं। असामाजिक तत्वों की करतूत भी इसे बताया जा रहा है। पुलिस कुछ कहने की स्थिति में नहीं है। इससे पहले वर्ष 2001 में मंकीमैन ने खूब दहशरत फैलाई। इसके बाद मुंहनोचवा आ गया। हैरानी की बात यह है कि किसी का भी कभी ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आया। समय के साथ ऐसी घटनाएं और किस्से थम जाते हैं। अफवाहें कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बन जाती हैं।...

निर्भया केस समाज को भी सबक जरूरी

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-देवकी शर्मा देश के बहुचर्चित व वीभत्स निर्भया दुराचार कांड में 5 मई, 2017 को सर्वाेच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट के बाहुबली फैसले के साथ बेटी के दर्द को बेहद करीब से महसूस करने वाले पीड़िता के उन माता पिता की भी तारीफ होनी चाहिए जो इंसाफ की आस में टकटकी लगाये हौंसले व हिम्मत से दुश्वारियों के बीच डटे रहे। तीन जजों की बेंच जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस भानुमति और जस्टिस अशोक भूषण ने घृणित अपराध को न सिर्फ सदमे की सुनामी बताया. बल्कि कहां की इस मामले में कोई रियायत नहीं दी जा सकती। जिस तरह से अपराध हुआ है वह एक अलग दुनिया की कहानी लगती है।  जो कुछ निर्भया के साथ हुआ वह किसी सभ्य समाज की हकीकत, तो नहीं था। यकीनन ऐसे फैसलों से बेटियों को शिकार बनाने वाले हैवानों में डर पैदा होगा. बलात्कार, छेड़छाड़, यौन उत्पीड़न, महिला अत्याचार, लिंगभेद या फिर यौन शोषण चाहे जो नाम दीजिए महिलाओं व लड़कियों को ही इसका सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति हर किसी के लिए चिंताजनक है। बड़ा सवाल भी है कि ऐसे लोगों को तब अपनी मां, बहन और बेटी का ख्याल क्यों नहीं आता, जब वह किसी को अपनी हवस का शिकार बना रहे होते हैं। ...

शक्तिमान तो देवभूमि से चला गया, अपने पीछे सवाल छोड़ गया

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शक्तिमान! तुम्हारा जाना बहुत दुःख दे रहा है। मैंने अभी तक देवभूमि के जो मामले लिखे वह ऐसे अपराध थे जो इंसानों ने इस दूसरे के खिलाफ किए थे। उनमें वह चीखे थे, चिल्लाये थे, बयान दिए थे। पुलिस के रोजनामचे और विवेचनाओं ने बहुत कुछ बयां किया था, लेकिन तुम्हारा दर्द उन सबसे बड़ा है इसलिए बयां करना मुश्किल है। तुम एक सियासतदान की कथित बहादुरी और गंदी राजनीति का शिकार हो गए। न चीख सके, न चिल्ला सके, न बचाव कर सके न कोई वार। क्योंकि तुम्हें तो इसकी बाजीगरी ही नहीं आती थी। तुमने तो पुलिस की ट्रेनिंग में वफादारी और हुनर सीखा था। तुम्हें सिखाया ही नहीं गया था कि कोई इंसान यदि जानवर बन जाए, तो उससे किस तरह पेश आया जाए। कोढ़ग्रस्त इंसानियत पर तुम हैरान थे। तुम्हारा बेजुबान होना जान पर बन आया। तुम्हारे साथ सब सरेआम हुआ था। कोई वारदात यूं होती तो तस्वीर दूसरी होती परन्तु तुम्हारे मामले में कानून का लचीलापन था। 13 मार्च से अब तक तुमने बहुत दर्द सहा। हम सिर्फ उस तड़प को महसूस ही कर सके। तुम्हें बचाने की हर संभव कोशिशें कीं, जिंदगी सलामत रहे इसलिए न चाहते हुए भी तुम्हारे पैर को भी जिस्म से जुदा करना मज...

'मैं आतंकवादी नहीं: संजय दत्त'

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यरवडा जेल से रिहा हुए फ़िल्म अभिनेता संजय दत्त ने मीडिया से आग्रह किया है कि ष्मैं आतंकवादी नहीं हूं अब 1993 के धमाकों से मुझे नहीं जोड़ेंण्ष् अवैध हथियार रखने के दोषी पाए गए 56 साल के संजय दत्त मई 2013 से जेल में थे जहां वह 42 महीने रहेण् 2007.08 के बीच उन्होंने जेल में 18 महीने बिताए थेण् साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल कोर्ट के उस आदेश पर मुहर लगाई थी जिसमें उन्हें कुल पांच साल की क़ैद सुनाई गई थीण् यरवडा जेल से बाहर निकलकर ज़मीन को चूमने और तिरंगे को सलाम करने पर उन्होंने कहाए ष्ये धरती मेरी मां हैए मैं हिंदुस्तान की धरती को प्यार करता हूं और मुझे भारतीय होने पर गर्व हैए इसीलिए मैंने अपनी सज़ा काटीण्ष् संजय दत्त ने कहा कि 23 साल से वे जिस आज़ादी के लिए तरस रहे थे वो आज उन्हें मिल गई हैण् उन्होंने कहा कि आज के दिन वो सबसे अधिक अपने पिता सुनील दत्त को श्मिसश् कर रहे हैंण्