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शनिवार, दिसंबर 18, 2010

पत्नी के टुकड़े करने वाला ये इंसान तो नहीं है....
-इंजीनियर बना सबसे बड़े क्रूरतम कत्ल का वारिस
-बेखौफ कहता है वह‘मार दिया,तो अब सजा दो’
-खूब चटक रही है पति-पत्नी के रिश्तों की बुनियाद

उस शख्स की उम्र 37 साल है। दिल्ली यूनिवर्सिटी का टॉपर है ओर पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर। बातचीत का अंदाज भी रईसी और पढ़े-लिखों वाला है, लेकिन दिल्ली से अमेरिका की नामी कंपनी,कलकत्ता व देहरादून तक का सफर कर चुके इस शख्स के दामन पर अपनी प्रेमिका से पत्नी बनी अनुपमा गुलाटी के खून के इतने दाग लगे हैं जिन्हें कानून के आर्यभट्ट भी नहीं मिटा सकते। हैवानियत व दरिंदगी की हर हद को उसने लांघा। किसी ने सोचा भी नहीं था कि पढ़ाई के बल पर ऊँचें ओहदे पर पहुंचा राजेश गुलाटी देश के सबसे बड़े क्रूरतम व सनसनीखेज मर्डर का वारिस बन जायेगा और इस बहस का पुख्ता सुबूत भी कि पति-पत्नी के रिश्ते की बुनियाद आधुनिकता की चकाचौंध में किस कदर चटक रही है। उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक ज्योति स्वरूप पांडे, आईजी राम सिंह मीना व एम.ए.गणपति तक हैरान हैं कि वह कभी इतने भयानक हत्याकांड से रू-ब-रू नहीं हुए। राजेश ने न सिर्फ अपनी पत्नी का कत्ल किया बल्कि उसके शव के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। दो महीने तक अपनी पत्नी की लाश को 350 लीटर व 20 हजार रूपये की कीमत वाले डीप फ्रीजर में रखकर सुकून की जिंदगी जीता रहा है और किसी को भी खबर नहीं हुई। कूल दिमाग से उसने जिस तरह घटनाक्रम को अंजाम दिया वह उसके अंदर की दरिंगदगी को दिखाने के लिये काफी है। पोस्टमार्टम में अनुपमा की आधी बॉडी से चिकित्सकों को खून की एक बूंद भी नहीं मिल सकी। दुर्भाग्य यह कि हत्याकांड देवभूमि में दशहरे की रात हुआ। इंजीनियर दशानन बन गया। यूं तो इस दिन बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व होता है,लेकिन उसने बुराई पर अच्छाई की जीत नहीं होने दी। जिस पत्नी का उसने मर्डर किया उससे उसने सात साल तक दिवानगी की हद तक प्रेम किया और फिर परिजनों की मर्जी के खिलाफ शादी। दो जुड़वा बच्चों का वह पिता भी बना जिनमें एक बेटा है ओर एक बेटी। बदनसीबी देखिए साढ़े चार साल के इन दो मासूमों को आज भी नहीं पता कि उनकी माँ इस दुनिया में नहीं है और पिता जेल जा चुका है। शायद जब पता लगे, तो हैवान के खाते में नफरत के सिवा कुछ न आये। अदालती आदेश पर इन बच्चों की परवरिश का जिम्मा फिलहाल मृतका अनुपमा गुलाटी के भाई सुजान प्रधान पर है। अपनी पत्रकारिता के सफर में बड़े-बड़े हत्याकांड मैं कवर करता रहा, लेकिन यकीन जानिए इतने क्रूरतम हत्याकांड से मैं खुद भी कभी बावस्ता हुआ। हत्यारोपी राजेश को अपने किये का जरा भी अफसोस नहीं है। बहुत ही शांत अंदाज में वह बात करते हुए कहता है-‘हां मैंने मार दिया,तो अब सजा दो। मुझे कोई अफसोस नहीं है क्योंकि मेरी जिंदगी खत्म हो चुकी है। घटना इस बहस को जन्म देने के लिये भी काफी है कि सात जन्मों का बंधन एक ही जन्म चल जाये, तो जीवन सफल हो जाये। रिश्ते कलंकित हो रहे हैं। प्यार भी छलावा बनकर नापाक हो रहा है। आये दिन परिवार बिखर रहे हैं। छोटा सा जीवन परिवार जोड़ने-तोड़ने में ही बीत जाता है। कहीं पति कत्ल कर रहा है,तो कहीं पत्नियां भी अपनी मांग का सिंदूर पतियों को कत्ल कराके पोंछ रही हैं। यकीनन यह सब सभ्य समाज में कोढ़ग्रस्त इंसानियत भर है। कत्ल का ये सिलसिला थम जायेगा इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता है,बशर्ते हम सुखद कल्पना तो कर ही सकते हैं कि रिश्तों का ऐसा भयानक अंजाम न हो। कामना ये भी बेगुनाह मासूम बच्चों का जीवन भी सुखमय हो। अनुपमा हत्याकांड की विस्तृत कहानी ‘मनोहर कहानियाँ’ के जनवरी,2011 अंक में।

मंगलवार, नवंबर 30, 2010

बलात्कारी तांत्रिक करोड़ों का वारिस
-नाबालिग से लेकर महिलाएं तक होती थीं शिकार,  
-अंधभक्तों से कमायी करोड़ों की दौलत
-अय्याशी के बाद अबॉर्शन कराने जाता था अस्पताल
उजली सीरत वाले 45 साल के उस शख्स को अंधविश्वास में डूबे उसके हजारों भक्त बंगाली बाबा उर्फ नदीम खादिम उर्फ मेहंदी हसन व जावेद आदि नामों से जानते थे। भक्तों की उसके यहां कतारें लगती थीं। यह शख्स इंसान के रूप में हैवानियत की हदों को लांघता था कुछ इस तरह कि इंसानियत भी शर्मसार हो जाये। उसकी गंदी नजरे लड़कियों व रईस घरों की औरतों के जिस्मों को भेदती थीं। तंत्र-मंत्र की आड़ मंे वह अय्याशी का घिनौना खेल खेलता था। मजबूरियों का फायदा उठाकर वह मौत और बर्बादी का खौफ दिखाता था। लड़कियां उसके लिये महज मनोरंजन का साधन थीं। यूं तो इस पापी ने आधा दर्जन से ज्यादा बेगुनाह लड़कियों को नापाक किया, लेकिन बेगैरती की इंतहा देखिए। इस पाखंडी ने अड़चनें दूर करने व तालीम देने के बहाने से एक परिवार को अपने शिकंजे में ले लिया। इस परिवार की तीन सगी बहनों को उसने अनगिनत बार अपनी हवस का शिकार बनाया। सभी बहनें तब से उसका शिकार होती आ रही थीं जबसे वह नाबालिग थीं। इतना ही नहीं जब लड़कियां प्रेगनेंट हो जातीं थी, तो वह उनका अबॉर्शन कराता था। रेप का यह सिलसिला कई सालों से बादस्तूर जारी था। एक लड़की की उम्र 19 साल, दूसरी की 18 साल तीसरी की महज 13 साल है ओर वह कक्षा पांच की छात्रा है। 1 नौकरानी को उसने अपना शिकार बनाया। बड़े घर की महिलाओं पर भी उसकी नजरें होती थीं। कॉलेज छात्रा की शिकायत पर तांत्रिक मुंबई के जे.जे. मार्ग पुलिस की गिरफ्त में आ गया। पुलिस ने पाखंडी को रिमांड पर लेकर पूछताछ व उसकी निशानदेही पर छापेमारी की, तो पुलिस के भी रोंगटे खड़े हो गए। तांत्रिक अपनी जिंदगी बादशाहों की तरह जीता था। फ्लैट्स में अय्याशी का हर साज-ओ-सामान मौजूद था। वह लड़कियों को फ्लैट पर भी बुलाता था। उसके 4 फ्लैट थे। पुलिस ने उसके कब्जे से 85 लाख रूपये से ज्यादा नगदी व 50 लाख रूपये के सोने-चांदी के जेवरात बरामद किये। करोड़ों की यह अकूत दौलत उसके बाप-दादा की जागीर या उसके खून-पसीने की कमायी नहीं थी बल्कि उसने पाखंड के बल पर अंधविश्वास में डूबे अपने भक्तों से ही झटकी थी। फ्लैट से कई आपत्तिजनक सामग्री भी मिलीं। अफसोस देखिए!वैज्ञानिक युग में मनुष्य भले ही कितनी भी ऊंचाईयों पर क्यों न पहुंच गया हो, लेकिन समाज में न तो तंत्र-मंत्र के नाम पर ढोंग करने वालों की कमी है और न ही अंधविश्वासियों की। आदिकाल से ही देश में तंत्रक्रिया पर भरोसा करने वाले लोग बहुतायत में हैं। लाखों लोग आज भी अंधविश्वास के सहारे ही जी रहे हैं। तांत्रिकों का धंधा भी खूब फलफूल रहा है।

सोमवार, अगस्त 23, 2010

दागदार नेताओं का ‘गन’ तंत्र’
यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का ‘गन’ तंत्र है। राजनीति का आरामदायक महल। जो कदम जेल की दहलीज पर होने चाहिए वह लोकसभा व राज्यसभा में चहलकदमी करते हैं। जिन हाथों में जंजीरें होनी चाहिए वह जनसेवक बनकर जनता की तकदीर लिख रहे हैं। उनका अच्छा-बुरा हर कदम कानून व संगीनों के साये में महफूज है। देशी-विदेशी हथियारों से उन्हें बेपनाह मोहब्बत है। कड़वी हकीकत ही सही, लेकिन देश की दागदार व पाक-साफ होती जा रही खादी की सुरक्षा का खर्च 100 करोड़ से भी ज्यादा है। राजनीति में दबंग माफिया, अपराध की दुनिया के बेताज बादशाह, बाहुबली, हिस्ट्रीशीटर, रासुकाधारी व छुटभैये अपराधी भी हैं। उनके खाते में लूट, हत्या, डकैती, बलात्कार जैसे जघन्य अपराध भी दर्ज हैं। सत्ता सबको चाहिए-कैसे भी, किसी भी कीमत पर। मतदान का आगाज व अंत हिंसक होता है। चुनाव आयोग के पसीने भी छूट जाते हैं। चुनावी लाभ के लालच में राजनीति का अपराधीकरण परपंरा बना, परन्तु देश के लिये चुनौती ओर गंभीर समस्या बन गया। डंके की चोट पर कह सकते हैं कि हथकंडों के बीच अपराध, अपराधियों, भ्रष्टाचार और राजनीति में चोली-दामन का साथ है। पंद्रहवी लोकसभा में करोड़पतियों का बोलबाला है। आपराधिक पृष्ठीभूमि वाले इतने सांसद कभी लोकसभा नहीं पहुंचे। बाहुबल और आपराधिक चरित्र का प्रताप लगातार बढ़ रहा है। इस परंपरा का टूटना उतना ही मुश्किल नजर आता है जितना सरकारी योजनाओं का असल गरीबों तक पहुंचना। राजनीति का अपराध्ीकरण अचानक नहीं हुआ। कोई एक दल अपराध की दुनिया वाले सपफेदपोश बाजीगरों को बाहर का रास्ता दिखाता है, तो दूसरा उसका दिली तौर पर स्वागत करता है और...... 

रविवार, जुलाई 18, 2010

30 साल से जंजीरों में कैद स्वर्ग की एक जिंदगी
कश्मीर की वादियां सुकून देने वाली होती हैं, लेकिन चुन्नीलाल की जिंदगी 30 साल से जंजीरों में कैद है। शहतूत के एक पेड़ से भी जैसे उसका अटूट बंध्न हो गया है। मौसम साल दर साल कई रंग बदलता है परन्तु बदनसीबी का पेड़ सदाबहार हो चुका है। कोई ओर होता तो दामन झटक देता, लेकिन चुन्नीलाल की पत्नी वैष्णों ने त्याग, समर्पण ओर मोहब्बत की मिसाल कायम की। पति के अर्द्वविक्षिप्त होने के बाद भी उसने चुन्नीलाल को नहीं छोड़ा। मेहनत मजदूरी करके किसी तरह बच्चों को बड़ा किया ओर उनकी शादियां भी कीं। पति की सेवा करने में भी वह कोई कसर नहीं छोड़ती। चुन्नीलाल को जंजीरों की कैद से आजाद करके वह उसे सेना या आतंकवादियों की गोलियां का शिकार नहीं बनवाना चाहती। वह आजाद घूमा तो किसी का भी शिकार हो सकता है। तमाम मुसीबतों के बीच वैष्णों आज भी अपनी हिम्मत की इबारत लिख रही है- (मनोहर कहानियाँ जुलाई अंक में प्रकाशित रचना के चंद अंश)-’जम्मू-कश्मीर के अधिकांश गांवों के लोग पौ फटते ही जग जाते हैं ओर सूरज ढलने के साथ ही अलसाने लगते हैं और......
इज्जत ने बनाया बेटी की कोख का कातिल
उत्तर प्रदेश में मोहब्बत की दुश्मन कही जाने वाली जुर्म की पथरीली जमीन व प्रेमी युगलों को मारने के लिये बदनाम उत्तर प्रदेष में मु.नगर की सरजमीं पर मानव व दीपिका के बीच एक इंस्टीट्यूट में कोचिंग के दौरान पहले दोस्ती ओर फिर प्यार हो गया। अलग-अलग जाति के चलते परिजनों ने इसका विरोध किया, लेकिन दोनों ने विवाह कर लिया। इसके बाद दीपिका के परिजन उसके दुश्मन बन गए। उसे कड़े इम्तिहान के दौर से गुजरना पड़ा। एमबीए व एयर होस्टेज का कोर्स कर चुकी व एक मल्टीनेशनल कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर की नौकरी कर रही दीपिका की कोख में बीटेक/एमबीए कर चुके व एक्सपोर्ट हाउस में सर्विस कर रहे मानव की मोहब्बत की निशानी पल रही थी। दीपिका के परिजन उसे धोखे से अपने साथ ले गए। उन्होंने मानव के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने का मारपीट करके दबाव बनाया जब वह नहीं मानी, तो एक महिला चिकित्सक से मिलीभगत करके उसे गर्भपात कराने की दवा पिलाकर इंजेक्शन लगवाये गए। हकीकत का भान होते ही वह अस्पताल से भाग गई। मानव ने उसे एक संस्था की मदद से अस्पताल में भर्ती कराया। दो दिन में दीपिका ने बहुत कुछ देखा। अपना मायका, जहां वह पैदा हुई, कुदरत का निजाम, अपनी उजड़ती कोख। उसने सात माह के बच्चे को जन्म दिया, लेकिन वह मासूम कुछ घंटों में ही इस दुनिया से रूखसत हो गया। दीपिका व मानव नहीं समझ पाये कि उन्हें आखिर किस गुनाह की सजा मिली। (मनोहर कहानियाँ जुलाई,2010 अंक में प्रकाशित कथा के संपादित अंश) -’अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी दीपिका शून्य को निहार रही थी। दिल-ओ-दिमाग को झकझोर कर देने वाले हादसे से रू-ब-रू होने के बाद उसके लिये तो जैसे जिंदगी के मायने ही खत्म हो गए थे.....

गुरुवार, जून 17, 2010

मौत की दहलीज पर खत्म मोहब्बत का सफर
-प्रेम के परिंदे मारकर मिली 5 को फांसी की सजा -हरियाणा कैथल का बहुचर्चित मनोज-बबली हत्याकांड **मनोज व बबली एक ही गांव के रहने वाले थे। उनका गौत्र भी एक ही था, लेकिन दोनों के जवां दिल एक-दूसरे के लिये धड़के ओर उनके बीच मोहब्बत हो गई। बंदिशों के बावजूद उसमें कोई कमी नहीं आयी। अपनी दुनिया बसाने के लिये दोनों घरों से भाग गए ओर शादी कर ली। परिजन उनके खून के प्यासे बने, तो उन्होंने अदालत से सुरक्षा मांगी। अदालत ने उन्हें सुरक्षा भी दी, लेकिन बबली के परिजनों ने दोनों का चलती बस से अपहरण किया ओर बेहरमी से दोनों को इज्जत की खातिर मौत के घाट उतार दिया। मनोज के परिवार का पंचायत के तुगलकी फरमान पर सामाजिक बहिष्कार हो चुका था बावजूद इसके उन्होंने न्याय की लड़ाई शुरू की। 33 महीने चली अदालत की कार्रवाई के बाद आखिर अदालत ने ऐतिहासिक फैंसला सुनाया ओर प्रेमी युगल के अपहरण के हत्या के आरोपियों में से 5 को सजा-ए-मौत, पंच को उम्र कैद व एक अन्य को भी सजा सुनायी। बदनाम होती खाप पंचायतों को सबक सिखाने का काम पहली बार हो सका परन्तु वह आज भी इस फैंसले के खिलाफ हैं। सजा-ए-मौत पाने वालों में बबली का भाई, मामा, ममेरे भाई व चाचा हैं। सवाल आज भी कायम है क्या इससे उनकी इज्जत बची? वैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा व राजस्थान जैसे इलाकों में मोहब्बत का सफर मौत की दहलीज पर जाकर ही खत्म होता है। पुरातन मान्यताओं को यहां सख्ती से पालन होता है, सामाजिक व्यवस्था भी ऐसी है कि युवाओं को इसकी इजाजत नहीं है। कानून व पंचायतों के बीच एक जंग दशकों से चली आ रही है। (मनोहर कहानियाँ, मई,2010 अंक में प्रकाशित कहानी के संपादित अंश) 30 मार्च,2010 की सुबह लगभग दस बजे थे। उस वक्त हरियाणा के करनाल जनपद में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश वाणी गोपाल शर्मा की अदालत के बाहर लोगों की भारी भीड़ जमा होने लगी थी...

रविवार, मई 09, 2010

जल्लाद भी खुश हो गया आतंकी कसाब की फांसी से
*आतंकी पर अब तक 36 करोड़ खर्च हुए, *राक्षस को जिंदा रहने का मिलेगा सालों मौका, *1 अरब से ज्यादा हो सकता है दुष्ट पर खर्चा, *जल्लाद बोला सरेआम होनी चाहिए फांसी
166 बेगुनाह लोगों की मौत व 350 को घायल करने का षडयंत्रकारी आरोपी खूंखार आतंकी मोहम्मद अजमल आमिर कसाब को फांसी होने से केवल वही लोग खुश नहीं है जिन्हें उसने कभी न भरने वाले जख्म दिये हैं बल्कि उसे फांसी देने के इंतजार में बैठा देश का इकलौता जल्लाद भी खुश है। उसकी दिली ख्वाहिश है कि वह जालिम दहशतगर्द को बहुत जल्द फांसी पर लटकाकर कुछ सेकेण्ड में ही उसकी सांसों की डोर को तोड़ दे, लेकिन अफसोस! भारत में ऐसी व्यवस्था आतंकवादियों के लिये नहीं है। देश के 70 फीसदी से भी ज्यादा लोग पाकिस्तानी राक्षस या यूं कहंे आतंकवाद की हांडी के सड़े हुए ‘एक चावल’ कसाब को नाम व शक्ल से जानते हैं। इसे विशेष अदालज के माननीय न्यायाधीश एम.एल. तहलियानी देश को आर्थिक चोट हमले से भी मिली ओर कसाब से भी। क्योंकि इस कसाब पर अब तक सरकार के 36 करोड़ रूपये खर्च हो चुके हैं। उसे सुविधाओं के बीच जिंदा रखना मजबूरी जरूर है, लेकिन यह भी सच है कि देश के लाखों लोगों को प्रतिदिन दो जून की रोटी भी नसीब नहीं होती। इतनी रकम से बहुत गरीबों का भला हो सकता था। फांसी की सजा के बाद अभी तो उसे पालना भी पड़ेगा। यह खर्च भी करोड़ों में ही होगा। यह अरब में भी पहुंच जाये, तो ताज्जुब नहीं होगा, क्योंकि भारत की कानूनी व्यवस्था ही ऐसी है। यह खर्च पाकिस्तान नहीं देगा बल्कि भारत की जनता की जेब से ही होगा।  सच तो ये है कि अब कभी न खत्म होने वाला इंतजार चलेगा...

सोमवार, अप्रैल 26, 2010

शिमला की वादियों में हुआ क्रूर कत्ल
आईआईटी रूड़की का छात्रा गौरव वर्मा व आईआईटी दिल्ली की टैक्सटाईल इंजीनियरिंग की छात्रा प्रगति टिब्बरवाल एक-दूसरे को प्यार करते थे। उनका प्यार कुछ ऐसे परवान चढ़ा कि आजादी का लाभ उठाकर दोनों के मर्यादाओं को लांघ दिया। गौरव ने अपना जन्म दिन शिमला जाकर मनाना चाहा, तो प्रेमी की खुशी के लिये प्रगति तैयार हो गई। रसिक होटल के रूम नंबर-26 में दोनों ने केक काटकर व शराब पीकर जन्म दिन का जश्न मनाया। दोनों शादी करना चाहते थे। अतीत के सच्चाई जानने के दौर में गौरव के सामने तीसरे का जिक्र आया, तो उसके दिल में नपफरत ने जन्म ले लिया ओर वह प्रगति के चरित्र पर शक कर बैठा। उसने प्रगति को सबक सिखाने का पफैंसला किया ओर बीयर की बोतल से सिर में प्रहार कर व जन्म दिन का केक काटने वाले चाकू से ही काटकर प्रगति की हत्या कर दी। (सत्यकथा के मई,2010 अंक में प्रकाशित कहानी के कुछ अंश) -मौसम चाहे जो भी शिमला का वातावरण हमेशा दिल को लुभावने वाला ही रहता है। प्राकृतिक सौंदर्य का हर रंग आँखों को लुभावना लगता है। फुरसत व जिंदगी के कई लम्हों को यादगार बनाने आने वाले लोगों का शिमला में तांता लगा रहता है। सैलानियों व शिमला का जैसे जन्म-जन्मांतर का नाता है। शिमला में शांत वातावरण व सामाजिक व्यवस्था का ऐसा असर है कि छिटपुट घटनाओं को यदि छोड़ दिया जाये, तो यहां अपराध कम ही घटित होते हैं। यह स्थिति कानून व समाज दोनों के लिये ही अच्छी कही जा सकती है, लेकिन शनिवार 27 फरवरी,2010 की सुबह का आगाज जितना शांत व खूबसूरत हुआ था दोपहर होते-होते वह उतना ही सनसनीखेज हो गया। क्या पुलिस क्या मीडिया सभी विक्ट्री टनल, मॉल रोड के नजदीक स्थित होटल रसिक की तरफ दौड़ पड़े थे।  सूचना पाकर बालूगंज थाना प्रभारी गुरदीप सिंह मय पुलिस बल के होटल पहुंचे गए थे। बेड पर एक युवती की खून से लथपथ लाश पड़ी हुई थी ओर उसके बदन से कपड़े नदारद थे।  पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तो वहां से एक लैपटॉप, पैन ड्राइव, शराब व बीयर की खाली बोलत, चाकू, पर्स से सौन्दर्य प्रशासन, एटीएम कार्ड व कपड़े आदि समान बरामद हुआ। इस सबके बीच खास बात यह थी कि एक छोटा केक भी टेबल पर रखा हुआ था। जिसमें से टुकड़ा कटा हुआ था और.......
बंदूक वाले मास्टर जी
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में नरभक्षी गुलदारों, तेंदूओं ओर बाघों का आतंक कोई नई बात नहीं है। बच्चों व बड़ों को वह अपना शिकार बनाते रहते हैं। लखपत सिंह रावत पेशे से शिक्षक थे। उन्हें सपनों में भी बच्चों की चीखें सुनायी देती थीं। वर्ष 2000 में उत्तराखंड का चमोली जिला नरभक्षी गुलदार से आतंकित हुआ, तो बड़े-बड़े शिकारी आये, लेकिन नरभक्षी इतना चालाक हो गया कि दो साल तक वह मारा नहीं जा सका। वह 12 बच्चों का अपना निवाला बना चुका था। तब लखपत सिंह ने सरकार से जिद करके नरभक्षी को मारने का परमिट लेकर कलम थामने वाले हाथ में बंदूक ली और उसे मार गिराया। इस शिक्षक ने मौत से सामना करने के लिये बंदूक थामी तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। अब तक यह शिक्षक उत्तराखंड के चमोली, टिहरी, पौड़ी, चंपावत, बागेश्वर, रूद्रप्रयाग, उत्तरकाशी व देहरादून आदि जिलों में दर्जनों नरभक्षियों को मार चुका है। उन्होंने नरभक्षियों पर शोध भी किया। उनके असामान्य व्यवहार के कारणों को जाना ओर लोगों को बचाव के उपाय भी बताये। लखपत सिंह को आज लोग बंदूक वाले मास्टर के नाम से जानते हैं। (पूर्ण कहानी मनोहर कहानियाँ के अप्रैल,2010 अंक में प्रकाशित) जंगल के शानदार जानवरों को मारकर वह अफसोस भी जाहिर करते हैं ओर उसके नरभक्षी बनने के मुकाम के पीछे इंसान को ही जिम्मेदार बताते हैं।.......

रविवार, अप्रैल 18, 2010

खाप पंचायत ने पति-पत्नी को भी बना दिया भाई-बहन
दुनिया की तमाम हलचल से बेखबर दस महीने का मासूम रौनक गहरी नींद के आगोश में था। इसके विपरीत कविता के मन में तूपफान उठ रहा था। एक ऐसा तूफान जो शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। वह ऐसे भंवर में उलझी हुई थी जिससे वह निकलना चाहती थी। यह भंवर था वक्त और उसकी जिंदगी। सुहागन होकर भी वह खुद को विधवा महसूस कर रही थी। उसके दिल-ओ-दिमाग पर शादी से लेकर खाप पंचायत के फैसले की यादें रह-रहकर ताजा हो रहीं थीं। नींद उसकी आंखों से कोसों दूर थी। कभी वह रौनक को देखती तो कभी शून्य को निहारने लगती। यह सिलसिला घंटों चलता रहा। वह खुद को दुनिया की सबसे बदनसीब विवाहिता समझ रही थी। सामाजिक व्यवस्था, पुरातन मान्यता व गोत्रा विवाद ने उसे ऐसा झटका दिया कि जिस पति के साथ वह ढाई साल से सुखद वैवाहिक जीवन व्यतीत कर रही थी उसी पति के साथ उसका रिश्ता भाई-बहन का बना दिया गया। जो सतीश कल तक रौनक का पिता था वह मामा बन गया। पंचायत का फरमान भले ही तुगलकी ओर दिलों को कभी न भरने वाले जख्म देने वाला था, लेकिन सामाजिक बहिष्कार के डर से उसे मानना सभी की मजबूरी थी। कविता के पति को भी सजा का दंश झेलना पड़ा था। उसे न सिर्फ गांव से निकाल दिया गया था बल्कि चल-अचल संपत्ति से भी बेदखल कर दिया गया था। सरेआम हुए अपमान ने कविता को झुलसा कर रख दिया। 30 जनवरी की रात कविता को पूरी रात नींद नहीं आ सकी। सुबह का आगाज सुखद माना जाता है, लेकिन कविता तो जैसे जिंदा लाश बन चुकी थी। उसका चेहरा भावहीन था और उदासी के बादल भी मंडरा रहे थे। फैंसला देने वाले समाज के कथित ठेकेदार कह रहे थे कि उन्होंने इंसाफ कर दिया। कविता आखिर ऐसे हालात से कैसे रू-ब-रू हुई इसके पीछे भी एक वजह थी....(सत्यकथा अप्रैल,2010 अंक में प्रकाशित)

शनिवार, अप्रैल 17, 2010

बाबा इच्छाधारी देह का व्यापारी
शिवमूर्त द्विवेदी खुद को साईं भक्त बताता था। उसने अपना नाम रखा था इच्छाधारी संत स्वामी भीमानंद जी महाराज चित्रकूट वाले। उसके सैंकड़ों भक्त थे, लेकिन साईं भक्ति व भगवा चोले की आड़ में वह देश का सबसे बड़ा सैक्स रैकेट चला रहा था। इच्छाधारी इस बाबा का नेटवर्क पूरे देश में फैला हुआ था। उसके रैकेट में 500 से ज्यादा स्कूली छात्राओं, मॉडल्स, छोटे पर्दे की कलाकारों, एयर होस्टेस से लेकर घरेलू महिलाएं तक थीं। र्ध्म की आड़ में वह करोड़ों की सम्पत्ति का वारिस बन गया। दूसरों को धर्म व नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाला खुद अनैतिकता में लिप्त था। कई नेताओं, पुलिस अधिकारियों व करोड़पतियों से उसके संबंध रहे। इच्छाधारी की जब पोल खुली तो दिल्ली पुलिस के अलावा उसके भक्त भी चौंक गए। वह आपराधिक पृष्ठभूमि का भी स्वामी था। (सम्पूर्ण कहानी मनोहर कहानियाँ के अप्रैल,2010 अंक में) कुछ हिस्सा... शॉम ढलने के साथ ही देश की राजधानी दिल्ली की रंगीनियां भी बढ़ जाती हैं। शॉपिंग माल्स, होटलों व सड़कों पर लंबी चमचमाती कारों का कापिफला भी सड़कों के सीने पर दौड़ता हुआ नजर आने लगता है। एक करोड़ की आबादी वाली राजधानी में सड़क चलते लोग एक-दूसरे को कम ही जानते हैं। व्यस्त जीवन शैली में दिन की थकान उतारने के लोगों के अपने-अपने तरीके हैं। कोई शॉपिंग करता है, कोई फिल्म देखने जाता है, कोई घूमना पसंद करता है तो कोई सीधे बिस्तर का रूख करके नींद के आगोश में चला जाता है। दक्षिणी दिल्ली स्थित पीसीआर मॉल हर रात की तरह 25 पफरवरी,2010 की रात भी रंग-बिरंगी रोशनी से नहाया हुआ था। मॉल के अंदर और बाहर लोगों की खासी भीड़ थी। एक से एक महंगी कारें वहां कतारबद्व खड़ी हुईं थीं। कारों ओर लोगों की इसी भीड़ के बीच एक सिल्वर कलर की होंडा स्विक कार भी वहां आकर रूकी। इस कार का नंबर था-डीएल-4सीएए-0300। कार की चमक ओर उसके नंबर को देखकर ही पता चल रहा था कि उसमें कोई ऊँचें रसूख वाला शख्स सवार था। कार के रूकते ही उसकी बायीं सीट से एक शख्स नीचे उतरा। लंबी-चौड़ी कदकाठी के वारिस जींस व टीशर्ट पहने उस शख्स के चेहरे पर डाढी व मूंछ होने के साथ ही लंबे बाल भी थे। इन बालों को उसने फैशनेबल अंदाज में पीछे करके रबड़ बैंड लगाया हुआ था। उसके चेहरे पर अनोखा तेज था। उसके सिर से लेकर नख तक रईसी की झलक थी। उसके हाथों में सोने की अंगूठियों के अलावा एक कलायी पर बेशकीमती रिस्टवॉच व दूसरी कलायी पर सोने का ब्रेसलेट था जबकि गले में मोटी गोल्डन चेन थी.....

शनिवार, अप्रैल 03, 2010

सानिया+शोएब: सरहदों ओर सवालों में उलझा रिश्ता
सानिया मिर्जा व पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक का गुपचुप ढंग से पनपा रिश्ता किसी मुकाम पर पहुंचने से पहले ही सवालों ओर विवादों के चक्रव्यूह में उलझ चुका है। दोनों ही चर्चित हैं ओर कई कारणों से विवादित भी रह चुकेे हैं। सरहदों ने भी इस रिश्ते को उलझन में डाल दिया है। दो देशों के झुलसते रिश्तों के बीच मोहब्बत का तराना गुनगुनाने का दावा करने वाले सानिया-शोएब पर तिरछी नजरें हैं। क्योंकि इसकी गुंजाइश कम है कि इससे मुल्कों के रिश्तों में तल्खी फनां होकर मिठास पैदा होगी या पुराने जख्मों के निशां मिट जायेंगे, लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री नवाज व पाक रेंजर डीजी मो. याकूब इसकी उम्मीद जता रहे हैं। निकाह के बाद सानिया दुबई में बसने की घोषणा कर चुकी है। हैदराबाद की ही शोएब की पूर्व कथित पत्नी आयसा सिद्दीकी इस वक्त सबसे बड़ी खलनायक बनकर उभरी हैं ओर लगातार गंभीर आरोप लगा रही हैं। शोएब के खिलाफ बंजारा हिल्स थाने में धारा-240,498 व 206 के अन्तर्गत मुकदमा दर्ज करा दिया गया है जिनमें गिरफ्तारी संभव है। बेटी को इंसाफ दिलाने के लिये एम.ए. मलिक भी मैदान में हैं। शोएब से निकाह के सुबूत के तौर पर निकाहनामा उसने पेश कर दिया है। दूल्हे के कॉलम मे शोएब के हस्ताक्षर भी हैं। दावे के तौर पर आयशा व शोएब का निकाह 2002 में हुआ। निकाह साबित करने के पर्याप्त सुबूतों की मौजूदगी का दावा है। शोएब के बहनोई इमरान जफर मलिक निकाहनामें को फर्जी करार दे रहे हैं। यह बात अलग है कि शोएब का पूरा परिवार आयशा को जानता है ओर पूर्व में शोएब ने आयशा से शादी की बात स्वीकार की थी। शोएब भी पाकिस्तान की तरह झूठ का पुलिंदा निकले। परन्तु आखिर में उन्होंने हार मानी ली ओर निकाह की सच्चाई पर मोहर लगा दी। फतवों को लेकर चर्चित देश की सबसे बड़ी इस्लामिक संस्था दारूल उलूम देवबंद ने भी साफ कर दिया है कि सानिया को अपना जीवनसाथी चुनने का लोकतांत्रिक दृष्टि से पूरा अधिकार है। यदि शोएब ने दूसरी शादी की हुई है, तो बाकायदा शरई मान्यताओं को पूरा करने के बाद ही वह शादी कर सकते हैं। भड़काऊ भाषण देने में माहिर शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे ने भी सानिया को निशाने पर लिया है। बकौल ठाकरे-‘सानिय अब भारतीय नागरिक नहीं रह गईं हैं। यदि सानिया वास्तव में दिल से भारतीय होतीं, तो उनका दिल किसी पाकिस्तानी के लिये नहीं धड़कता।’ सानिया के करियर पर भी कटाक्ष हुआ-‘टेनिस कोर्ट पर जीत की अपेक्षा वह चुस्त कपड़ों, फैशन ओर प्रेम प्रसंगों की वजह से ज्यादा चर्चा में रही हैं।’ कहने वाले कहते हैं कि 100 करोड़ की आबादी वाले देश में कोई कुंवारा लड़का नहीं बचा जो सानिया ने पाकिस्तान का रूख किया। इस कदम को भारतीयों के लिये भी शर्मनाक व जज्बातों पर चोट करने वाला बताया जा रहा है। राष्ट्रगान के अपमान के अदालत में चल रहे चार मुकदमों की वारिस सानिया पर सिया धर्म गुरू मौलाना कल्बे सादिक की टिप्पणी है कि सानिया को हिन्दुस्तान के सत्रह करोड़ मुसलमानों में से कोई ऐसा मुसलमान नहीं मिला जिससे वह निकाह कर सके। उन्होंने सानिया की देशभक्ति पर भी सवाल उठाया है। वैसे दहशतगर्दी व आतंकवाद की भयानक तस्वीर वाले पाकिस्तान को लेकर सानिया ने अपने करियर में कभी कोई अल्फाज नहीं बोला। इस्लाम के ठेकेदारों के निशाने पर सानिया तब आयीं थीं जब उनके स्कर्ट पहनने पर टिप्पणियां हईं। सानिया ने यह कहकर बोलती बंद कर दी कि उलेमा स्कर्ट नहीं खेल देखें। 32 एमबी के एक कथित एमएमएस ने भी सानिया को दुख पहुचंाने का काम किया। ग्रामीण क्षेत्र में प्रेम क्राड़ा वाले इस एमएमएस में कितनी सच्चाई इस हकीकत को कोई भी नहीं जानता। वैसे एमएमएस के आने के बाद वह काफी समय तक टेनिस कोर्ट में नहीं दिखीं थीं। इंटरनेट पर लोग अब भी इस एमएमएस को देखते हैं। सानिया ने अपने बचपन के दोस्त शोहराब से ऐसी दोस्ती निभायी कि जितने आलीशान ढंग से 10 जुलाई,2009 को सगाई हुई थी उतनी ही बेदर्दी से टूट भी गई।  

सोमवार, मार्च 15, 2010

इश्क के जुनून में खानम का खून
-नितिन सबरंगी
जरायम को लेकर भी बदनाम हो रहे उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में प्रतिदिन की भांति उस दिन भी लोग अपनी दिनचर्या में व्यस्त थे। बस अड्डों पर आमतौर पर मुसाफिरों की भीड़ जमा रहती है। सोहराब गेट बस अड्डे पर भी दोपहर के वक्त सैंकड़ों मुसाफिर मौजूद थे। खुर्जा-बुलन्दशहर को जाने वाली रोडवेज बस आकर खड़ी हो गई। इस बस का नंबर था यूपी 15 एटी-1593। बस के रूकते ही एक-एक कर उसमें दर्जनों लोग सवार हो गए। खूबसूरत दिखने वाली एक दुबली-पतली युवती भी बस की तरफ बढ़ी। युवती नीले रंग की जींस ओर छींटदार कुर्ता पहने हुए थी। यह लिबास उस पर खूब फब रहा था। एक तो खूबसूरती दूसरे उसका लिबास ये दोनों ही चीजे ऐसी थीं जो यात्रियों का ध्यान उसकी तरफ खींच रहीं थीं। युवती के कंधे पर पर्स झूल रहा था। वह युवती अकेली नहीं थी उसके साथ अधेड़ महिला भी थी। पहली ही नजर में देखकर लग रहा था कि दोनों के बीच कोई बेहद नजदीकी रिश्ता था। बस तैयार खड़ी थी। वह दोनों भी उसी बस में सवार हो गईं। उनके चढ़ते ही परिचालक ने सरसरी सी नजरें डालकर पूछा,‘‘कहां जाना है आपको?’’‘‘भैया बस गुलावठी तो जायेगी ना?’’ युवती के जवाब में सवाल भी था। उसकी आवाज बेहद मधुर थी। परिचालक ने जल्दी से जवाब दिया,‘‘हां-हां जायेगी आप उध्र बैठ जाइये।’’ उसने चालक के पीछे वाली खाली पड़ी सीट की तरफ इशारा करते हुए कहा। युवती खिड़की से सटकर बैठ गई जबकि उसके साथ वाली महिला उसके बराबर में बैठ गई। बस में चूंकि यात्रियों की संख्या अभी कम थी इसलिए चालक यात्रियों को इंतजार करने लगा अलबत्ता उसने बस को स्टार्ट करके छोड़ दिया। इसी बीच उस युवती का मोबाइल बज उठा। उसने एक नजर स्क्रीन पर उभरे नंबर पर डाली फिर जल्दी से मोबाइल कान से लगाकर बोली,‘‘हैलो।’’ दूसरी तरफ न जाने कौन था, लेकिन युवती ने फोनकर्ता को बताया,‘‘मैं अभी बस अड्डे पर हूं।’’ इतना बताने के साथ ही उसने फोन काटा ओर उसे पर्स के हवाले कर दिया। कुछ मिनट यूं ही बीत गए। यही वह वक्त था जब एक युवक टहलता हुआ वहां आया। उसके चेहरे पर हल्की घबराहट थी ओर वह चौकन्नी नजरों से सवारियों को देख रहा था। सम्भवतः उसे किसी की तलाश थी। अचानक युवक की नजरें खिड़की के पास बैठी उस युवती पर जाकर ठहर गईं। वह तेजी से खिड़की के पास पहुंच गया अचानक उसकी आँखों में नफरत उभर आयी। वह युवती को खा जाने वाली नजरों से घूरते हुए.....(मनोहर कहानियाँ, दिसम्बर,09 अंक में प्रकाशित) पूर्ण कहानी के लिये mailto:मेल-nitinsabrangi@gmail.com

रविवार, मार्च 14, 2010

इंतकाम की आग
-नितिन सबरंगी
(बिजनौर यूपी का बहुचर्चित कांड) दुनिया की तमाम हलचल से बेखबर पूरा गांव नींद के आगोश में था। रात्रि का दूसरा पहर शुरू हो चुका था। वक्त तो नींद का ही था, लेकिन 17 साल की फातिमा व उसके पिता अख्तर की आँखों से नींद कोसों दूर थी। दोनों के ही मनों में तूफान सा उठ रहा था। एक ऐसा तूपफान जो शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। उसके दिल-ओ-दिमाग पर पंचायत और उसके फैसले की यादें रह-रहकर ताजा हो रहीं थीं। अपमान व तिरस्कार ने उन्हें झकझोर दिया था। करवटेें बदल-बदलकर दोनों को कब नींद आ गई इसका पता उन्हें भी नहीं चल सका। फातिमा ने जो कुछ भी देखा था वह दिल को दहला देने वाला था। वह अपने पिता के कमरे में सो रही थी। तभी उनका पड़ोसी राशिद व उसका बड़ा भाई हसीनुद्दीन दबे पांव वहां आ गये। कुछ आवाज सुनकर उसकी आंख खुली तो देखा तो उनके हाथों में खून से सनी कटार चमचमा रही थी और वह खा जाने वाली नजरों से उसे घूर रहे थे। फातिमा की निगाह जमीन पर पड़ी तो हलक से चीख निकल गई। खून से लथपथ उसका पिता अख्तर जमीन पर पड़ी किसी मछली की तरह तड़प रहा था। फातिमा से यह सब देखा नहीं गया वह फुर्ती से खड़ी हुई और उसने राशिद का गिरेबान थाम लिया,‘‘यह तुमने क्या किया मेरे अब्बू को मार डाला अल्लाह तुम्हें कभी माफ नहीं करेगा।’’‘‘हां हमने इसकी मौत के परवाने पर दस्तखत कर दिये, क्योंकि यह हमारा नहीं पंचायत का फैंसला था। पंचायत ने जो हुक्म दिया हमने उसकी तामील कर दी है।’’‘‘ये तो बेगुनाह हैं। आरोप ओर पंचायत तो तुम लोगों की साजिश थी।’’ उसने रोते हुए कहा तो राशिद बेहयाई से हंसते हुए बोला,‘‘पंचायत के फैंसले को साजिश का नाम मत दे फातिमा। तुम्हारी जगह कोई ओर लड़की होती तो अब तक शर्म से मर जाती। तू सोई रहती तो मरने में दिक्कत नहीं होती अब तू तड़पकर मरेगी।’’ कहने के साथ ही उसने फातिमा को जोरदार धक्का दिया वह  कटे पेड़ की तरह जमीन पर गिर गई। उसे अपने सामने मौत नाचती नजर आ रही थी। हसीनुद्दीन ने आगे बढ़कर फातिमा के दोनों हाथो ंको पीछे से कब्जा लिया, तो राशिद दहाड़ा,‘‘तुम्हें मरना ही है। अल्लाह से दुआ है वह तुम्हारी रूह को सुकून पहुंचाये।’’ कहते हुए उसने खंजर फातिमा के सीने में घोंप दिया ओर......(मनोहर कहानियाँ, फरवरी,2010 अंक में प्रकाशित) पूर्ण स्टोरी के लिये मेल 

शनिवार, मार्च 13, 2010

जम्मू-कश्मीर का अमीना-रजनीश प्रकरण
मोहब्बत का अधूरा सफर
-नितिन सबरंगी
प्राकृतिक सौन्दर्य की गोद में बसे श्रीनगर की अमीना मराजी व जम्मू के राजेश उर्फ रजनीश शर्मा में प्यार हुआ, तो उन्होंने साथ जीने-मरने की कसमें खायीं। आग के दरिया में तैरकर दोनों ने मजहब की दिवारे गिराकर शादी भी कर ली। अमीना धर्म बदलकर आंचल शर्मा हो गई। इससे उसके परिजन दुश्मन बन गए। दोनों के जीवन में खुशियां शायद एक महीने की ही मेहमान थी। पुलिस ने राजेश को हिरासत में लिया, तो उसकी लाश हवालात में लटकी पायी गई। आंचल पर जैसे मुसीबतों को पहाड़ टूट पड़ा। सुर्खियों में आये इस मामले ने जम्मू-कश्मीर में हड़कम्प मचा दिया। गमजदा आंचल को इंसाफ दिलाने के लिये धर्मिक संगठन भी मैदान में उतर आये। आंचल ने हत्या का आरोप लगाकर अपने परिजनों व पुलिस के खिलाफ जंग शुरू कर दी, लेकिन अचानक एक दिन वह घर से लापता हो गई। अगले दिन जब मिली तो फिर से अमीना बन चुकी थी। अमीना की किस्मत ने जो खेल उसके साथ खेला उसमें वह खुद उलझकर रह गई। राजेश यदि इस दुनिया में होता, तो अमीना शायद ही मोहब्बत में दगा करती। (प्रकाशित मनोहर कहानियाँ मार्च,2010 अंक में) *- सर्दी हो या गर्मी लोगों दिनचर्या सुबह ही शुरू हो जाती है। जम्मू-कश्मीर में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। 15 जनवरी,2010 की सर्द सुबह का आगाज भी कड़ाके की ठंड के साथ ही हुआ। जम्मू शहर के बसीनगर थानांतर्गत रोड़े की छपरी इलाके में रहने वाली श्रीमती राजकुमारी अलसाते हुए सोकर उठ गईं। प्रतिदिन की तरह आदतन वह अपनी बहू आंचल को जागने के लिये उसके कमरे की तरफ बढ़ गईं। उसके कमरे का दरवाजा अधखुला था..ओर.....पूर्ण स्टोरी के लिये मेल -nitinsabrangi@gmail.com

शुक्रवार, मार्च 12, 2010

खूंखार आतंकी को मारने वाली रूखसाना-
लड़कियां ऐसी भी होती हैं
-नितिन सबरंगी
भारत पाकिस्तान के बार्डर से सटे प्राकृतिक सौन्दर्य की गोद में सिमटे राज्य जम्मू-कश्मीर का आतंकवाद से रिश्ता सालों पुराना है। आतंकवादी संगठनों की गतिविधियों ने इस प्रदेश के वास्तविक चेहरे को बिगाड़ने का काम किया। भारत के सिरमौर इस स्वर्ग की सरजमीं पर दनदनाने वाले सैंकड़ों आतंकवादी सालभर में मारे जाते हैं उनके नापाक मंसूबे नाकायमयाब होते है और उनसे लाखों रूपये के विदेशी हथियार भी बरामद होते हैं। जाहिर है यह सुखद पहलू है, लेकिन दुखद पहलू यह भी है कि आतंकवादियों के खिलाफ होने वाली कार्रवाई में भारत माँ के लाल भी शहीद हो जाते हैं। कश्मीर के आवाम का तो दहशत व खौफ से चोली-दामन का साथ है। उनके दिल-ओ-दिमाग पर हर वक्त एक अंजाना सा खौफ तारी रहता है। आतंकवादियों की बंदूके कब किसके सीने को छलनी कर दें इस बात को कोई नहीं जानता। कड़वी हकीकत यह है कि आये दिन होने वाली घटनाओं की जनता व पुलिस दोनों ही आदि हो चुके हैं। सितम्बर के महीने में हल्की ठंडक के साथ ही मौसम गुलाबी सा हो चला था। 28 सितम्बर,2009 की सुबह राजौरी जिले के समूचे पुलिस महकमे से लेकर प्रदेश पुलिस के मुखिया कुलदीप खोड़ा तक चौंक गए थे। आतंकवादी घटनाओं से रू-ब-रू होना तो अध्किारियों के लिये कोई नई बात नहीं थी, लेकिन यदि कुछ नया था तो यह थी वह सूचना जो सुबह से कई मर्तबा वायरलैस सेट पर गूंज गई थी। वायरलैस पर शाहदरा चौकी प्रभारी असलम मलिक की आवाज गूंजी थी,‘‘कंट्रोल रूम मैसेज नोट कीजिएगा हमारे इलाके में एक आतंकवादी मारा गया है। वह अपने साथियों के साथ एक घर में घुस गया था आतंकवादी को एक लड़की ने मारा है...आतंकियों की दो ए.के.-47 रायपफले भी छीन ली गई हैं ओवर।’’ कंट्रोल रूम में तैनात ड्यूटी ऑपफीसर को मैसेज सुनते ही पहली मर्तबा झटका लगा। आतंकी को एक लड़की ने मारा है यह बात बिल्कुल अटपटी थी। संदेश पर संदेह हुआ तो पुष्टि के लिये उसने पूछा,‘‘चौकी शाहदरा दोबारा रीपीट करें आतंकवादी को किसने मारा है?’’‘‘एक लड़की ने। अभी हम पफोर्स के साथ मौके पर जा रहे हैं ओवर।’’ कुछ ही पलों में कंट्रोल रूम से यह सूचना आला अध्किारियों को प्रसारित कर दी गई। सूचना ने सभी को चौंका दिया था, क्योंकि जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी इलाकों के सैंकड़ों गांव ऐसे थे जहां मौत का डर दिखाकर आतंकवादी पनाह लेते आये थे। पुलिस व सेना की तमाम कोशिशों के बाद भी वह घुसपैठ करते थे। लोग बेबस थे यदि कभी किसी ने आतंकियों को विरोध् भी किया, तो आंतकी दिल दहला देने वाली घटनाओं को अंजाम दे बैठते थे। लोगों के सिरों पर मौत मंडराती थी। ऐसे हालातों में एक लड़की ने आतंकवादी को मार दिया था जम्मू-कश्मीर के इतिहास में यह पहली घटना थी। ऐसा साहस पहले कभी किसी ने नहीं दिखाया था।घटना कैसे हुई थी? मारा गया आतंकवादी कौन था? उसके कितने साथी थे? उनके आने का मकसद क्या था? ऐसे तमाम सवाल थे जिनका जवाब तत्काल किसी के पास नहीं था। घटना चूंकि.......(मनोहर कहानियाँ के जनवरी,2010 अंक में प्रकाशित) पूर्ण स्टोी के लिये मेल करें-nitinsabrangi@gmail.com

तेजाब की जली एक पाकिस्तानी लड़की की दास्तां-
बदसूरती बनी मिसाल
-नितिन सबरंगी
(प्रकाशित महानगर कहानियाँ, फरवरी,2010) बिस्तर पर पड़ी सारिया शून्य को निहार रही थी। उसके लिये जैसे जिंदगी के मायने ही खत्म हो गए थे। शरीर में पैदा होने वाली बेहद जलन, दर्द व बेबसी से वह रू-ब-रू हो रही थी। उसके हजारों ख्वाब तिनका-तिनका हो चुके थे जिन्हें समेटना अब नामुमकिन था। तेजाब की एक बौछार ने उसकी खूबसूरती को जलाकर ध्ुंआ-ध्ुंआ कर दिया था। सारिया की आँखों के आंसू जब तक रहते साथ देते पिफर खुद ही जैसे रूखसत हो जाते। पिछले कई दिनों से अस्पताल का बर्न वार्ड उसकी दर्दीली चीखों से रह-रहकर दहल उठता था। उसके दिन-ओ-रात बिस्तर पर ही होते थे। प्रतिदिन डॉक्टर आते थे ओर उसके चेहरे की पट्टियां बदलकर चले जाते थे। सारिया के परिजन, नाते-रिश्तेदार उसके ठीक होने की दुआएं कर रहे थे। गमजदा व सोच में डूबी सारिया को देखकर साये की तरह उसके साथ लगी श्रीमती रूबीना ने उसे संभालने का प्रयास किया,‘‘सब्र करो बेटी अल्लाह तआला सब ठीक कर देगा।’’‘‘अब क्या ठीक होगा अम्मी। मैंने किसी का क्या बिगाड़ा था जो मुझे ऐसी सजा मिली। क्या खुदा अपने नेकदिल बेगुनाह बंदों पर ऐसा जुल्म करता है?’’‘‘ऐसा नहीं सोचते बेटी अल्लाह गुनाह करने वाले को भी कतई नहीं बख्शेगा।’’ एक आँख को छोड़कर सारिया का पूरा चेहरा ही पट्टियों से लिपटा हुआ था। उसका दर्द उसकी आँख व आवाज के कंपन के साथ होने वाली सिसकियों में सापफ झलकता था। श्रीमती रूबीना की दिलासा के बावजूद सारिया की आँख का कोर गीला हो गया। दिल तो श्रीमती रूबीना का भी बहुत रो रहा था, लेकिन वह आँखों में आंसू लाकर बेटी के जीने का हौंसला नहीं तोड़ना चाहती थी। उन्होंने किसी तरह खुद को संभालकर सारिया के सिर पर हाथ रखकर बोली,‘‘हिम्मत रख बेटी एक तू ही तो हमारा सहारा है।’’‘‘अब हिम्मत नहीं होती अम्मी। बेहतर हो खुदा मुझे मौत ही बख्श दे।’’‘‘या खुदा! अपनी जुबान पर ऐसी बात मत ला।’’ श्रीमती रूबीना ने उसे समझाने का प्रयास किया। लियाकत अली भी बेटी को संभालने की कोशिश करते थे, लेकिन वह दोनों ही जानते थे कि उनकी बेटी को जीते जी अब नरक सा जीवन मिल गया है। सारिया के साथ जो कुछ घटित हुआ था उससे हर कोई आहत हुआ था।दरअसल 16 वर्षीय सारिया दिल दहला देने वाली घटना से बावस्ता हुई थी। भारत के पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के लाहौर..........उसने गिलास रखी ट्रे उसकी तरपफ बढ़ायी। वह कुछ समझ पाती कि उससे पहले ही माजिद ने चीते की सी पफुर्ती से बोतल का तरल पदार्थ सारिया के चेहरे पर डाल दिया। भयानक जलन भरे दर्द से सारिया चिल्लाने लगी। माजिद ने जो तरल पदार्थ पफेंका था वह तेजाब था। घटना को अंजाम देकर माजिद तत्काल वहां से भाग गया। बेटी की हालत देखकर लियाकत अली के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उन्होंने भी शोर मचा दिया। शोर-शराबा सुनकर आसपास के लोग भी वहां एकत्रा हो गए। सारिया के चेहरे से गंध्युक्त ध्ुंआ निकल रहा था। लोगों ने आनन-पफानन में सारिया को अस्पताल मंें भर्ती कराया गया। बामुश्किल सारिया की जान बच सकी। उसका चेहरा अस्सी प्रतिशत जल.........
अपनी खूबसूरती के कुचल जाने का दर्द सारिया अब मुस्कराहट के साथ दूर कर देती है। वैसे वह कहती है-‘इंसान का चेहरा ही सबकुछ नहीं होता। सच्ची खूबसूरती किसी भी व्यक्ति के अंदर निहित होती है बाहर नहीं।’ सारिया ने साबित कर दिया कि दृढ़ निश्चय व सकारात्मक दृष्टिकोण के बल पर मंजिल को पाया जा सकता है। पूर्ण स्टोरी के लिये मेल करें...nitinsabrangi@gmail.com" href="mailto:...nitinsabrangi@gmail.com

गुरुवार, फ़रवरी 11, 2010

चूहा बोला- "सक्ल पर मत जा पागल मेरा होंसला देख ....
मुंबई मे शिव सेना की गुंडागर्दी रुकने का नाम नहीं ले रही है. बाल ठाकरे के आग लगाऊ बयान जारी है. साहरुख खान से लेकर नामी हस्तीयों, राहुल गाँधी और महारास्ट्र की सरकार तक पर निशाना साधा जा रहा है. ये बात अलग है कि शिव सेना 4rth नम्बर कि पार्टी है. पार्टी के १८०० लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. राहुल गाँधी शेर को आदर्स मानने वाले ठाकरे को उसके ही गढ़ में जाकर ओकात दिखा चुके है. सभी लोग ठाकरे को ही गलत ठहरा रहे है, कोई उन्हें बूढ़ा शेर , कोई बिना दांत वाला शेर तो कोई, हटधर्मी कह रहा है, लेकिन जनाब का होंसला तो देखो. मुख्यमंत्री तक को कह दिया कि उनकी सरकार तो खुद पाकिस्तान कि मदद से बनी है. किसी तानासाहा कि तरह एलान करते है.1 चुटकला गोर करने लायक है.
"जंगल में एक चूहा पगला गया था. एक दिन वह एक हाथी से बोला- "बोल मेरे साथ कुश्ती करेगा?" हाथी ने उसकी बात पर गोर नहीं दीया और आगे बढ़ने लगा लेकिन चूहा पीछे पड़ गया. "बोल न मेरे साथ कुश्ती करेगा?" हाथी हंसकर बोला- "अबे चल सक्ल देखी है अपनी?" इस पर चूहा बोला-"सक्ल पर मत जा मेरा होंसला तो देख."

रविवार, जनवरी 24, 2010

**हदों को लांघता अंधविश्वास <("_")>

इंसान भले ही चाँद पर क्यों न पहुच गया हो लेकिन समाज मे न तो तंत्र मन्त्र का ढोंग करने वालों की कमी है और न ही अंध विश्वास करने वालो की. सहारनपुर मे एक काली बिल्ली का खोफ कुछ एस तरह फे़ला की लोगों ने बंगाल से हजारों खर्च करके तांत्रिकों की एक टीम बुलवा ली. उन्होंने लोगो का जमकर पागल बनाया. आफत और अफवाओ ने पुलिस के भी होश उडा दिए. अंधविश्वास का आलम यह था की लोगों ने दारुल उलूम के मुफ्ती आरिफ कासमी व सहर काजी की अपील को भी नहीं माना. ढोंगी तांत्रिकों ने कई बकरों व मुर्गों की भी बलि दे डाली. उन्होंने एक लड़की को जबरन मुर्गे का खून कटोरे मे डालकर पीने पर मजबूर किया. काली बिल्ली के साये से बचने को लोगों ने महंगाई के इस दोंर मे १० कुंतल सरसों सड़कों पर बिखरवा दी. आखिर पुलिस नींद से जागी और मुकदमा दर्ज करने के साथ ही बंगाली बाबावों की तलाश मे दबिसे दी तो वह भाग गए. अब काली बिल्ली का साया भी नहीं है. ये घटना सबूत ही एस बात का की हमारे देश मे अंधविश्वास की जड़ें किस हद तक मोजूद है. काली बिल्ली से साये को भगाने मे लोगों ने जीतना रुपया ढोंगी बाबावो पर खर्च क्या उतने मे उनके इलाके का विकाश हो सकता था. गरीबों को कई दीनों का भरपेट भोज़न मील सकता था. मेरा इससे जुडा आर्टिकल "सरस सलिल" नवम्बर,०९ के अंक में.*******
**संसद मे भी नींद जरूरी....शर्मनाक.....

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद जहा जनता के चुने हुए नेता अपनी आवाज़ बुलंद करते है. अपने इतिहाश मे कई शर्मनाक पलों को समेटे हुए है. फिर भी हमारे नेता हरकतों से बाज़ नहीं आते. आज लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट पर संसद मे जमकर बहस हुई. बहस तेज आवाज़ मे हुई, कई बार सांसदों को शांत किया गया. ये तो मामूली बात हुई. इस सब शोर के बीच एक सांसद आराम की नींद सोते रहे. पता नहीं नेताजी ने जनता के लिये कितनी महनत की होगी की थककर जनाब को नींद ही आ गई. ये नेताजी बहस कर रहे कांग्रेस के जगदम्बिका पाल के ठीक पीछे थे. फोटो उनकी हकीकत बयां कर रहा है. जाहिर है उनके इलाके की जनता को अपने नेता की ये नींद पसंद नहीं आयगी.**

शुक्रवार, जनवरी 22, 2010

बयान+महंगाई+आम जनता के आंसू = शरद पंवार
केंद्रीय खाद व् उपभोक्ता मामलों में मंत्री शरद पंवार पता नहीं क्या कहते है? या तो वह अनजाने में बयान देते है या फिर उनकी वजह से दलालों और बिचोलियों को बड़ा फायदा हो रहा है. उनके बयान का बाजार पर तुरंत क्या फर्क पड़ता है और आम आदमी किस तरह से अपनी किस्मत और सरकार को कोसकर पिसता है शायद इसका उन्हें अंदाजा भी न हो. बेचारी आम जनता की बात को छोड़ भी दीया जाये तो उनके अपने ही उनके बयानों से खुश नहीं है. वह राज्यों की सरकारों और गेर दलों के निशाने पर है. उनकी वजह से पार्टी के गुब्बारे की हवा निकल रही है. महंगाई को रोकने में नाकाम सरकार अपनी विफलता को छिपा रही है. कभी शरद पंवार कहते है कि खाद पदार्तों की कीमत बढ सकती है, कभी कहते है कि दूध कि कीमत बढ सकती है. चीनी के दामों पर कहते है कि *मै कोई ज्योतीस नहीं जो बता सकू कि चीनी के दाम कब कम होंगे* एक वरिष्ट मंत्री ही यदि इस तरह का बयान दे तो क्या कहा जा सकता है. वेसे कमर तोड़ महंगाई सरकार पर तगड़ी बिजली बनकर गिरेगी. वेरोधी दल भी इसको मुद्दा बनायंगे. सरकारी आंकड़े ही खुद सरकार को चिड़ा रहे है. फिलहाल तो जरूरत महंगाई व् शरद पंवार के बयानों पर लगाम लगाने की है. हर तरफ से घिरने के बाद शरद पंवार सारा दोस मीडिया के सिर पर मढ़ देते है की उनके बयान को तोड़ मरोड़कर पेश किया जाता है.

मंगलवार, जनवरी 05, 2010


अब आए ऊंट पहाड़ के नीचे..........
पुरानी कहावत सामने आ रही है. दो ऊंट या सम्मानजनक सब्दों में अपनी दुनिया के बेताज नहीं "ताज वाले बादशाह" रुचिका कांड के आरोपी राठोर और लाखो लोगों की आस्था का किला बने संत आशाराम बापू गिरफ़्तारी से बचने के लिये घूम रहे है. मोह माया से लगाव न रखने वाले करोरों के स्वामी आशाराम बापू को एक मामले में अग्रिम जमानत देने से कोर्ट ने इंकार कर दीया है. उनकी गिरफ़्तारी का रास्ता बिलकुल साफ़ है. बाबा भगवान की सरन में है. इसी तरह वर्दी वाले गुंडे रुचिका कांड के आरोपी राठोर के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने पर अब उनकी गिरफ़्तारी भी हो सकती है. उम्मीद है जनाब को अब कोर्ट के बाहर हंसी नहीं आयगी. देश की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री में आरुषी के पिता तलवार उनकी पत्नी नुपुर तलवार एक बार फिर सी. बी. आई के निशाने पर है. आरुषी कांड यकीनन देश का अनोखा बड़ा केश है जीसने अपराध के बड़े बड़े जानकारों के दीमाग को हिलाकर रख दिया है. वह साजिश का इतना बड़ा सरताज है जो लाखों दीमाग से आगे की सोच रखता है. उसका रसूख भी है, दो़लत के बल पर वह किसी से भी जमीर को खरीदने की ताकत रखता है. अरुषी के खून का कारण भी कई राजों का राजदार है. सीबीआई अब फिर जाच करेगी. सवाल यही है क्या कोई साजिश का सरताज बेनकाब होगा? अब देखते है क्या होता है.