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प्यार की राह में बर्बाद हुई लड़की, शबनम तुम्हें फांसी जरूरी है

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‘शबनम ओर उसके प्रेमी सलीम के हक में मौत की सजा मुकर्रर की जाती है। इन दोनों को तब तक फांसी पर लटकाया जाये जब तक इनकी मौत न हो जाए’ कुछ इसी तरह न्यायाधीश ने एक डबल एमए युवती शबनम और उसके प्रेमी के हक में फांसी की सजा पर मुहर लगा दी। दरअसल शबनम उत्तर प्रदेश के जनपद मुरादाबाद के समीपवर्ती जनपद अमरोहा के बामनहेड़ी गांव की रहने वाली थी। वह नजदीक ही रहने वाले एक लड़के समीम से प्रेम करती थी। शबनम के पिता पेशे से शिक्षक थे। उन्होंने अपने  बच्चों को भी ऐसी ही तालीम दी। नतीजन दो बेटे इंजीनियर बन गए जबकि शबनम डबल एमए करके शिक्षा मित्र बन गई। शबनम अपनी मर्जी से निकाह करना चाहती थी और पिता की पूरी प्रापॅर्टी पर अपना हक भी। परिवार के जिंदा रहते यह मुमकिन नहीं लिहाजा वर्ष 2005 में एक रात उसने व उसके प्रेमी ने कुल्हाड़ी से गले काटकर अध्यापक पिता, माँ, इंजीनियर भाई, दूसरे भाई, भाभी, मासूम भतीजे व एक रिश्तेदार लड़की का कत्ल किया। पूरे परिवार में सिर्फ शबनम ही जिंदा बची थी। अपने समय का यह सामूहिक नरसंहार बेहद चर्चित कांड रहा। तत्कालीन मुख्यमंत्री सुश्री मायावती को भी मौके पर आना पड़ा। पुलिस को कत्ल ...

सलमान खानः शिकार से सजा तक, कानून सभी के लिए बराबर

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लंबी जद्दोजहद के बाद हिट एंड रन मामले में आखिर दोषी पाए जाने के बाद बॉलीवुड स्टार सलमान खान के हक में अदालत ने 5 साल की सजा मुकर्रर कर दी। इसको लेकर बहस शुरू हो गई। वास्तव में अदालत सबूतों और गवाहों पर काम करती है नकि भावनाओं का कोई स्थान होता है। इंसाफ के प्रति लोगों की उम्मीदों का चिराग और रोशन हुआ है। सभी को कानून का सम्मान करना चाहिए। नेता, अभिनेता, आम आदमी कानून तो सभी के लिए बराबर है। यह ठीक है कि सलमान अभिनेता हैं, लोगों के दिलों में उनके लिए जगह हैं, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि उन्हें कुछ भी करने की आजादी हो या पुराने गुनाहों पर पर्दा डाल दिया जाए। सलमान चूंकि रॉल मॉडल हैं इसलिए उनकी जिम्मेदारी कानून का पालन करने की ज्यादा हो जाती है। अजीब तर्क दे रहे हैं लोग। कोई कहता है कि सलमान गरीब बच्चों की बहुत मदद करते हैं, उनका ख्याल रखते हैं। वह बहुत अच्छे हैं। भला इन सब बातों का केस से क्या मतलब। इस आधार पर क्या उन्हें छूट मिलनी चाहिए थी। सलमान जो भी करते हैं उसकी रकम लेते हैं। ऐसा सक्षम व्यक्ति यदि गरीब बच्चों की मदद करता है, तो यह बहुत अच्छा है। जो भी सक्षम हैं उन्हें ऐसा क...

ऐसी भी क्या राजनीति, मौत पर ‘आप’ की शर्मनाक सियासत

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 दिल्ली के जंतर-मंतर पर आम आदमी पार्टी की रैली में सरेआम फांसी लगाने वाले गजेन्द्र की मौत एक मुद्दा बन गई है। कितनी अजीब बात है कि हजारों लोगों के सामने एक शख्स रफ्ता-रफ्ता भाषणबाजियों के बीच अपनी सांसों की डोर को तोड़कर मौत की चौखट पर चला जाता है ओर सब मौत का लाइव तमाशा देखते हैं। कथित ईमानदार पार्टी के नेता, कार्यकर्ता, पुलिस व लोकतंत्र का चौथा खंबा मीडिया भी मुस्तैदी से उस वक्त मौजूद था। इंसानियत की गिरावट का शायद यह सबसे निचला पायदान है या दूसरे शब्दोें में कोढ़ग्रस्त इंसानियत की हकीकत। क्योंकि गजेन्द्र के साथ इंसानियत का भी सरेआम जनाजा निकला। गजेन्द्र अब इस दुनिया में नहीं है। उसकी मौत एक बड़ा मुद्दा ओर सवाल है। राजनीति, संवेदनाओं के साथ ही वादों का सिलसिला भी चलता रहेगा, लेकिन उसके परिवार का दुःख शायद ही कम हो।  तेजी से मुकाम हासिल करने वाली आम आदमी पार्टी ने प्रचार के बाद हजारों की भीड़ जुटाई। रैली का मकसद खुद को किसानों का सबसे बड़ा हितैषी घोषित करना था। विपक्षियों की नीतियों पर सवाल उठाना था। तीखे प्रहार करना था। पूर्व में कई पार्टियों से ताज्लुक रखकर एमएलए का चुनाव...

हुजूर! 42 कत्ल के कातिल भी तो होंगे?

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- पीड़ितों के दर्द पर जमकर होती रही सियासत। - हाशिमपुरा कांड में 28 साल बाद आया फैसला। -नितिन शर्मा ‘सबरंगी’ 1987 में मेरठ दंगे के दौरान हुए बहुचर्चित हाशिमपुरा कांड में 42 लोगों की मौत पर दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने सबसे पुराने पेंडिंग केस में फैसला देकर सभी 16 आरोपियों को बरी कर दिया। 3 आरोपियों की मौत फैसले से पहले ही हो गई। फैसला हैरानी व नाखुशी दे रहा है। अदालत के दहलीज के बाहर यह हैरानी जरूरी भी है क्योंकि मानवता को शर्मसार करने वाले कांड में 28 साल बाद आये फैसले में भी कोई दोषी नहीं मिला। सरकारी तंत्र  ओर पैरवी के नकारेपन का इससे बड़ा सुबूत भला ओर क्या होगा। सवाल यह कि कत्ल हुए तो कातिल भी तो होंगे, लेकिन अदालती फैसले सुबूतों ओर गवाहों  की रोशनी में आते हैं। कानून भावनाओं से नहीं चलता वरना मौत का मंजर देखने वाली आँखों में इंसाफ की तड़प जरूरी दिखती। मांओं ओर बेवाओं का दर्द भी दिखता। रोजी-रोटी का संकट, घर के चिरागों के बुझने से हुआ अंधेरा ओर दुआओं में सिर्फ इंसाफ मांगते बूढे माँ-बाप दिखते। हाँ राजनीति के बाजीगर ऐसे दर्द को वोटों के मुनाफे के लिए वक्त-वक्त पर जरूर ...
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‘मुफ्त’ के सपनों की बड़ी चुनौती -जनतंत्र उम्मीदों के जहाज पर सवार  -जनता के तराजू में संतुलित होना जरूरी। -नितिन शर्मा ‘सबरंगी’ दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की जीत को प्रचंड, अविश्वसनीय, अद्भुत या अप्रत्याशित कुछ भी नाम दीजिए, लेकिन जनतंत्र ने उम्मीदों से उन्हें अपने राज्य के मुखिया के रूप में चुन लिया। यकीनन यह एक लहर थी जो अचानक नहीं बल्कि तब आयी जब जनता की सही नब्ज को पकड़ा गया। उसके बताया गया कि ‘मै आप हूं, वह करूंगा जो आप चाहते हो।’ जनतंत्र सबसे बड़ी ताकत है इसलिए सत्ता के ताज के ख्वाहिशमंद को पहले उसके सामने झुकना पड़ ता है। जनता बड़ी उम्मीदों से वोटों का ताज देती है। बेचारगी के हालातों में उसका यही इकलौता हथियार होता है। जनतंत्र की ताकत को हासिल करने के लिये केजरीवाल ने तमाम आलोचनाओं, धरनों, बयानबाजियों, टकराव ही नहीं बल्कि थप्पड़ और काली स्याही का भी सामना किया। सभ्य समाज व स्वस्थ लोकतंत्र में वार व काली स्याही जैसी हरकतें निदंनीय थीं। जनता की उम्मीदों को हद दर्जे तक जगाया गया। यह हुनर ही सही, लेकिन केजरीवाल ऐसे हुनर के बाजीगर हैं जो सबकुछ बदलने की बात क...
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काली कमाई का बड़ा कुबेर -इंजीनियर की दौलत से हर कोई हैरान  -20 साल में बनाया करोड़ों का साम्राज्य यादव सिंह व उसकी आलीशान कोठी। -नितिन शर्मा ‘सबरंगी’  नोएडा, ग्रेटर नोएडा व यमुना प्राधिकरण के सस्पेंड हो चुके चीफ इंजीनियर यादव सिंह का नाम आयकर के शिकंजे में आने के बाद अचानक राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गया। यह सुर्खियां उसे करोड़ों की काली कमाई की कलयुगी बाजीगरी के चलते मिली। आगरा के एक छोटे से गांव निकलकर वर्ष 1980 में अपनी नौकरी शुरू करने वाला मामूली इंजीनियर इतना बड़ा धनपति बन गया कि उसने कमाई के मामलों में बड़े-बड़ों को पछाड़ दिया। कुछ सालों में उसने देश-विदेश में इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर दिया कि हर कोई हैरानी से उसकी चर्चा करता है। राजनीति को सुरक्षा कवच बनाकर उसने बेशुमार दौलत कमायी। उसके जानकार बताते हैं कि वह सभी काम दौलत के तराजू में ही तौलता था। उसे शोहरत नहीं बल्कि दौलत व रसूख से लगाव था। करोड़ों रूपये उसकी कारों, घरों व लॉकरों में पड़े रहते थे। उसने इतना माल बटोरा कि खुद भी ठीक से संभाल नहीं पा रहा था। काली कमाई की ऐसी दिवानगी अक्सर यादव सिंह जैसे लोगों ...
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नरेन्द्र मोदी का नायक बनना -नितिन शर्मा ‘सबरंगी’ दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जनता ने उम्मीदों से नरेन्द्र मोदी को अपना नायक चुना। आस्था, विश्वास व अपेक्षा के माहौल में यकीनन चमत्कारी व ऐतिहासिक करवट रही। बात राजनीति की नहीं उन हालातों की है जिनसे देश गुजर रहा था। जनता को कठपुतली बनाकर जले पर नमक डाला जा रहा था। बयानबाजियों में अंहकार व गुरूर झलकता था। यदि ऐसा नहीं होता, तो जनता तख्ता पलट क्यों करती ? यूं भी जनता किसका तख्ता पलट दे कोई नहीं जानता, मौका मिलते ही वह गलतफहमी दूर कर देती है क्योंकि वक्त के बाद व ही सबसे बड़ी ताकत है। 55 करोड़ 10 लाख मतदाताओं ने इसे साबित भी कर दिखाया। समझ आ गया होगा कि जनता किसी की गुलाम नहीं होती! जिनकी गलतफहमी दूर हुई है वह मंथन करें कि लोकसभा-2014 में इतिहास ने आखिर करवट क्यों ली? नेताओं को सत्ता के गुरूर, मनमानी, भ्रष्टाचार के कीर्तिमान, झूठे किले खड़े करके सिंघासन सजाने की गलतफहमी से निकल जाना चाहिए। त्रस्त जनता के बीच नरेन्द्र मोदी अनोखी छवि बनाकर उभरे ओर दिलों पर छा गए। लोगों ने पार्टी को नहीं व्यक्ति का चुनाव किया। युवाओं ने उन्हें पसंद क...