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मौत पर खत्म नेताओं से रिश्तों का सफर महत्वाकांक्षी लड़कियों को दौलत शोहरत का नशा -समाज में भरे हुए हैं कई गोपाल कांडा   रसूखदार नेता व उद्योगपति गोपाल कांडा को लेकर अपनी सांसों की डोर तोड़ने वाली गीतिका शर्मा की मौत ने उन चेहरों को बेपर्दा किया है जो उजले रहते हैं। इसके साथ ही फिजा, शहला मसूद, भंवरी देवी, मधुमिता, कविता चौधरी, शिवानी भटनागर व नैना साहनी जैसे बहुचर्चित कई मामले ताजा हो गए हैं। ख्वाहिशें लड़कियों को जिस जन्नत में ले जाती हैं, वहां वापसी के दरवाजे नहीं होते। तेजी से उड़ान भरने के सपने कभी-कभी खूनी हो जाते हैं। ऐसे विकास की कीमत चुकानी पड़ती है। सभी में खूबसूरत युवतियों का नेताओं से रिश्तों का सफर मौत की दहलीज पर जाकर खत्म हुआ आखिर क्यों? यह चकाचौंध भरे बदलते समाज की हकीकत है। दरअसल कुछ युवतियां भी थोड़े वक्त में वह सब पा लेना चाहती हैं जिसके लिये मेहनत वालियां सालों तरसती रहती है। उनकी जल्द प्रगति राज रहती है। शायद मतलब निकलते तक। बाद में उनकी कहानी भयानक अंजाम के रूप में सामने आती है। रंगीनमिजाज नेता पैसे का जाल फेंकते हैं जिसमें जाल फंस जाता है। अति महत्वाक...
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ऑनर किलिंग एक खूनी सिलसिला -अपने ही करते हैं अपनों का कत्ल -इज्जत की खातिर होता  खूनी खेल क्या कोई पिता अपनी ही बेटी के सिर को काटकर धड़ से अलग कर सकता है, क्या कोई भाई अपनी बहन को गोली से उड़ा सकता है? क्या कोई माँ बेटी के खून से हाथ रंग सकती है? क्या लोग किसी को सरेआम फांसी पर लटका सकते हैं? यह सवाल तुगलकी है, लेकिन इस दिल दहला देने वाली हकीकत का आइना अक्सर देखने को मिल रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश ओर हरियाणा में पुलिस के रोजनामचे में सैंकड़ों कत्ल ऐसे दर्ज हैं जिनकी मौत के परवानों पर अपनों ने ही दस्तख्त कर दिये। प्रेमी युगलों के नसीब में मौत दर्ज करने वाले अपने ही होते हैं। प्रेम करना गुनाह है क्योंकि पुरातन मान्यताएं, संस्कार ओर परंपराएं इसकी इजाजत नहीं देती। समाज के ठेकेदार कबिलाई अंदाज में कानून को ठेंगा दिखाकर चौंकाने वाले फैंसले देते हैं। खूनी खेल खेलते वक्त उन्हें कानून का डर नहीं सताता। प्रेमी युगलों की हत्याएं यूं तो समाज में कथित इज्जत को बचाने की खातिर की जाती हैं, लेकिन क्या कत्ल कर देने से इज्जत बच जाती है? इस सवाल का जवाब कई वर्षों की पत्रकारिता में मैं खुद भी नहीं...
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रेल हादसा, कौन है आखिर मौतों का जिम्मेदार? -जांच, मुआवजा और राजनीति का तमाशा कब तक। तूफानी गति से दौड़ती कालका एस्सप्रेस कानपुर के नजदीक अचानक लगे ब्रेक से पटरी से उतर गई। डब्बे क्षतिग्रस्त हो गए। इसके साथ ही मची चीख-पुकार ने पत्थर दिलों को भी दहला दिया। डब्बों से निकलती खून से लथपथ लाशों में तब्दील हुए यात्रियों और मौत को बेहद करीब से देखने वाले घायलों ने सोचा भी नहीं था कि उनका सफर इस कदर खौफनाक होगा। कई घरों के चिराग बेवक्त हमेशा के लिये बुझ गए। सरकार ने मरहम के तौर पर मुआवजे की घोषणा करके मौतों की कीमत लगा दी। कुछ इस तरह कि ‘हम सबक नहीं लेंगे। गलती तो हुई है, लेकिन कीमत भी तो दे रहे हैं।’ जिनके घरों के चिराग बुझ गए उनके दर्द की दवा पैसा नहीं। जांच की बात भी हो गई। जाहिर है जांच, मुआवजा और राजनीति का जमकर तमाशा होगा। जांच के नतीजे रसूखदारों के इशारों पर नाचकर हमेशा की तरह फाइलों में दफन हो जायेंगे। लाशों की कीमत लगाने की मानसिकता में हादसों से सबक लेने का काम किया भी नहीं जाता। अफसोसजनक ही सही, लेकिन इस परंपरा को इस कदर ईमानदारी से निभाया जाता है कि किसी एक हादसे के जख्म भरते नहीं ओर...
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इज्जत की खातिर सजा-ए-मौत सलाखों के पीछे पुलिस गिरफ्त में बैठे उस नौजवान के चेहरे पर चिंता की लकीरों का नाम-ओ-निशान नहीं था। बल्कि अपने किये पर जैसे उसे गर्व महसूस हो रहा था। उसने किसी ओर को नहीं बल्कि अपनी जवान बहन की बेरहमी से गला काटकर हत्या कर दी थी। बहन की मौत के परवाने पर दस्तख्त उसने समाज में अपने परिवार की इज्जत बचाने की खातिर किये, लेकिन क्या वाकई उसकी इज्जत बची? इसका जवाब खुद उसके पास भी नहीं था। मामला उत्तर प्रदेश का है। पुलिस क लिये उस सुबह का आगाज अच्छा नहीं रहा। एक युवक दौड़ता हुआ थाने आया। उसके कपड़ों पर खून के धब्बे लगे हुए थे। उसके दाएं हाथ में तेजधार वाला छुरा था जिस पर खून लगा हुआ था। युवक ने बताया कि उसने बदनामी की वजह बनी अपनी बहन का कत्ल कर दिया है। पुलिस ने मृतका का खून से लथपथ शव बरामद किया। पूछताछ में चौंकाने वाली बात सामने आयी। दरअसल 19 वर्षीया शाइस्ता को मोहब्बत का तराना गुनगुनाना मौत की चौखट पर ले गया था। वह बी.ए. प्रथम वर्ष की पढ़ायी कर रही थी। इसी दौरान एक युवक से वह प्यार करने लगी थी। कातिल भाई इमरान को अपने किये का जरा भी पछतावा नहीं था। बकौल इमरान-‘शाइस्ता...
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पत्नी के टुकड़े करने वाला ये इंसान तो नहीं है.... -इंजीनियर बना सबसे बड़े क्रूरतम कत्ल का वारिस -बेखौफ कहता है वह‘मार दिया,तो अब सजा दो’ -खूब चटक रही है पति-पत्नी के रिश्तों की बुनियाद उस शख्स की उम्र 37 साल है। दिल्ली यूनिवर्सिटी का टॉपर है ओर पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर। बातचीत का अंदाज भी रईसी और पढ़े-लिखों वाला है, लेकिन दिल्ली से अमेरिका की नामी कंपनी,कलकत्ता व देहरादून तक का सफर कर चुके इस शख्स के दामन पर अपनी प्रेमिका से पत्नी बनी अनुपमा गुलाटी के खून के इतने दाग लगे हैं जिन्हें कानून के आर्यभट्ट भी नहीं मिटा सकते। हैवानियत व दरिंदगी की हर हद को उसने लांघा। किसी ने सोचा भी नहीं था कि पढ़ाई के बल पर ऊँचें ओहदे पर पहुंचा राजेश गुलाटी देश के सबसे बड़े क्रूरतम व सनसनीखेज मर्डर का वारिस बन जायेगा और इस बहस का पुख्ता सुबूत भी कि पति-पत्नी के रिश्ते की बुनियाद आधुनिकता की चकाचौंध में किस कदर चटक रही है। उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक ज्योति स्वरूप पांडे, आईजी राम सिंह मीना व एम.ए.गणपति तक हैरान हैं कि वह कभी इतने भयानक हत्याकांड से रू-ब-रू नहीं हुए। राजेश ने न सिर्फ अपनी पत्नी का कत्ल किया...
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बलात्कारी तांत्रिक करोड़ों का वारिस -नाबालिग से लेकर महिलाएं तक होती थीं शिकार,   -अंधभक्तों से कमायी करोड़ों की दौलत -अय्याशी के बाद अबॉर्शन कराने जाता था अस्पताल उजली सीरत वाले 45 साल के उस शख्स को अंधविश्वास में डूबे उसके हजारों भक्त बंगाली बाबा उर्फ नदीम खादिम उर्फ मेहंदी हसन व जावेद आदि नामों से जानते थे। भक्तों की उसके यहां कतारें लगती थीं। यह शख्स इंसान के रूप में हैवानियत की हदों को लांघता था कुछ इस तरह कि इंसानियत भी शर्मसार हो जाये। उसकी गंदी नजरे लड़कियों व रईस घरों की औरतों के जिस्मों को भेदती थीं। तंत्र-मंत्र की आड़ मंे वह अय्याशी का घिनौना खेल खेलता था। मजबूरियों का फायदा उठाकर वह मौत और बर्बादी का खौफ दिखाता था। लड़कियां उसके लिये महज मनोरंजन का साधन थीं। यूं तो इस पापी ने आधा दर्जन से ज्यादा बेगुनाह लड़कियों को नापाक किया, लेकिन बेगैरती की इंतहा देखिए। इस पाखंडी ने अड़चनें दूर करने व तालीम देने के बहाने से एक परिवार को अपने शिकंजे में ले लिया। इस परिवार की तीन सगी बहनों को उसने अनगिनत बार अपनी हवस का शिकार बनाया। सभी बहनें तब से उसका शिकार होती आ रही थीं जबसे वह नाबालिग ...
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दागदार नेताओं का ‘गन’ तंत्र’ यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का ‘गन’ तंत्र है। राजनीति का आरामदायक महल। जो कदम जेल की दहलीज पर होने चाहिए वह लोकसभा व राज्यसभा में चहलकदमी करते हैं। जिन हाथों में जंजीरें होनी चाहिए वह जनसेवक बनकर जनता की तकदीर लिख रहे हैं। उनका अच्छा-बुरा हर कदम कानून व संगीनों के साये में महफूज है। देशी-विदेशी हथियारों से उन्हें बेपनाह मोहब्बत है। कड़वी हकीकत ही सही, लेकिन देश की दागदार व पाक-साफ होती जा रही खादी की सुरक्षा का खर्च 100 करोड़ से भी ज्यादा है। राजनीति में दबंग माफिया, अपराध की दुनिया के बेताज बादशाह, बाहुबली, हिस्ट्रीशीटर, रासुकाधारी व छुटभैये अपराधी भी हैं। उनके खाते में लूट, हत्या, डकैती, बलात्कार जैसे जघन्य अपराध भी दर्ज हैं। सत्ता सबको चाहिए-कैसे भी, किसी भी कीमत पर। मतदान का आगाज व अंत हिंसक होता है। चुनाव आयोग के पसीने भी छूट जाते हैं। चुनावी लाभ के लालच में राजनीति का अपराधीकरण परपंरा बना, परन्तु देश के लिये चुनौती ओर गंभीर समस्या बन गया। डंके की चोट पर कह सकते हैं कि हथकंडों के बीच अपराध, अपराधियों, भ्रष्टाचार और राजनीति में चोली-दामन का साथ है। पं...