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‘मुफ्त’ के सपनों की बड़ी चुनौती -जनतंत्र उम्मीदों के जहाज पर सवार  -जनता के तराजू में संतुलित होना जरूरी। -नितिन शर्मा ‘सबरंगी’ दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की जीत को प्रचंड, अविश्वसनीय, अद्भुत या अप्रत्याशित कुछ भी नाम दीजिए, लेकिन जनतंत्र ने उम्मीदों से उन्हें अपने राज्य के मुखिया के रूप में चुन लिया। यकीनन यह एक लहर थी जो अचानक नहीं बल्कि तब आयी जब जनता की सही नब्ज को पकड़ा गया। उसके बताया गया कि ‘मै आप हूं, वह करूंगा जो आप चाहते हो।’ जनतंत्र सबसे बड़ी ताकत है इसलिए सत्ता के ताज के ख्वाहिशमंद को पहले उसके सामने झुकना पड़ ता है। जनता बड़ी उम्मीदों से वोटों का ताज देती है। बेचारगी के हालातों में उसका यही इकलौता हथियार होता है। जनतंत्र की ताकत को हासिल करने के लिये केजरीवाल ने तमाम आलोचनाओं, धरनों, बयानबाजियों, टकराव ही नहीं बल्कि थप्पड़ और काली स्याही का भी सामना किया। सभ्य समाज व स्वस्थ लोकतंत्र में वार व काली स्याही जैसी हरकतें निदंनीय थीं। जनता की उम्मीदों को हद दर्जे तक जगाया गया। यह हुनर ही सही, लेकिन केजरीवाल ऐसे हुनर के बाजीगर हैं जो सबकुछ बदलने की बात क...
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काली कमाई का बड़ा कुबेर -इंजीनियर की दौलत से हर कोई हैरान  -20 साल में बनाया करोड़ों का साम्राज्य यादव सिंह व उसकी आलीशान कोठी। -नितिन शर्मा ‘सबरंगी’  नोएडा, ग्रेटर नोएडा व यमुना प्राधिकरण के सस्पेंड हो चुके चीफ इंजीनियर यादव सिंह का नाम आयकर के शिकंजे में आने के बाद अचानक राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गया। यह सुर्खियां उसे करोड़ों की काली कमाई की कलयुगी बाजीगरी के चलते मिली। आगरा के एक छोटे से गांव निकलकर वर्ष 1980 में अपनी नौकरी शुरू करने वाला मामूली इंजीनियर इतना बड़ा धनपति बन गया कि उसने कमाई के मामलों में बड़े-बड़ों को पछाड़ दिया। कुछ सालों में उसने देश-विदेश में इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर दिया कि हर कोई हैरानी से उसकी चर्चा करता है। राजनीति को सुरक्षा कवच बनाकर उसने बेशुमार दौलत कमायी। उसके जानकार बताते हैं कि वह सभी काम दौलत के तराजू में ही तौलता था। उसे शोहरत नहीं बल्कि दौलत व रसूख से लगाव था। करोड़ों रूपये उसकी कारों, घरों व लॉकरों में पड़े रहते थे। उसने इतना माल बटोरा कि खुद भी ठीक से संभाल नहीं पा रहा था। काली कमाई की ऐसी दिवानगी अक्सर यादव सिंह जैसे लोगों ...
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नरेन्द्र मोदी का नायक बनना -नितिन शर्मा ‘सबरंगी’ दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जनता ने उम्मीदों से नरेन्द्र मोदी को अपना नायक चुना। आस्था, विश्वास व अपेक्षा के माहौल में यकीनन चमत्कारी व ऐतिहासिक करवट रही। बात राजनीति की नहीं उन हालातों की है जिनसे देश गुजर रहा था। जनता को कठपुतली बनाकर जले पर नमक डाला जा रहा था। बयानबाजियों में अंहकार व गुरूर झलकता था। यदि ऐसा नहीं होता, तो जनता तख्ता पलट क्यों करती ? यूं भी जनता किसका तख्ता पलट दे कोई नहीं जानता, मौका मिलते ही वह गलतफहमी दूर कर देती है क्योंकि वक्त के बाद व ही सबसे बड़ी ताकत है। 55 करोड़ 10 लाख मतदाताओं ने इसे साबित भी कर दिखाया। समझ आ गया होगा कि जनता किसी की गुलाम नहीं होती! जिनकी गलतफहमी दूर हुई है वह मंथन करें कि लोकसभा-2014 में इतिहास ने आखिर करवट क्यों ली? नेताओं को सत्ता के गुरूर, मनमानी, भ्रष्टाचार के कीर्तिमान, झूठे किले खड़े करके सिंघासन सजाने की गलतफहमी से निकल जाना चाहिए। त्रस्त जनता के बीच नरेन्द्र मोदी अनोखी छवि बनाकर उभरे ओर दिलों पर छा गए। लोगों ने पार्टी को नहीं व्यक्ति का चुनाव किया। युवाओं ने उन्हें पसंद क...
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देशभक्त जवानों पर गंदी राजनीति न कीजिए! वतन की हिम्मत सैनिकों से है, राजनीति से नहीं -नितिन सबरंगी विवादित बयानबाजी में कुख्यात हो चुके यूपी के ताकतवर मंत्री आजम खां ने कहा कि करगिल का युद्व मुस्लिम सैनिकों ने लड़ा.....कुर्बानी देने वाले मुस्लिम थे...ओर भी बहुत कुछ। कहना पड़ेगा कि राजनीति वाकई हद दर्जे तक गिर गई है। इसीलिए अलोकतांत्रिक, मूर्खतापूर्ण ओर शर्मनाक बयान आया। आजम साहब को कौन समझाये कि सरहदों की हिफाजत करने वाले राजनीति से आजाद होते हैं। उनकी सोच घिनौनी ओर अपाहिज नहीं होती, कोई लालच भी नहीं होता। फर्ज के प्रति ईमानदारी उन की सबसे बड़ी दौलत होती है। सवाल यह है कि ऐसा कहकर सैनिकों को क्यों राजनीति में ला रहे हैं। कुर्बानियों पर सियायत क्यों कर रहे हैं? जनाब एक वही तो है जिनकी बदौलत हम महफूज सोते हैं। आप जैसे नेताओं के हाथ सरहदें नहीं दी जा सकती, क्या भरोसा सरहदों का भी सौदा कर दें क्योंकि राजनीति अब फर्ज नहीं सिर्फ मुनाफा देखती है। वैसे जनाब करगिल युद्व किसी हिन्दू-मुसलमान ने नहीं बल्कि भारत के सच्चे देशभक्त जवानों ने जीता था, भारतीयों ने जीता था, हिन्दुस्तानियों ने ...
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न भरने वाले जख्म ओर जिम्मेदार कोई नहीं? सियासत की गंदी शतरंज पर हमदर्दी का तमाशा सदियों पुराने रिश्तें नफरत के खंजर से घायल छेड़छाड़ की एक घटना के बाद उत्तर प्रदेश के जनपद मुजफ्फरनगर में साम्प्रदायिक दंगा हो गया। 3 दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए। बहुत से घायल हुए। -‘तकलीफ तब होती है जब इंसानियत नफरतों के खंजर से घायल होती है।’ सामाजिक धरातल चटका, सदियों पुराने रिश्ते, अमन, इंसानियत घायल हुई, करोड़ों का नुकसान हुआ, शहर पर बदनुमा दाग लगा ओर सौहार्द बिगड़ गया। हिंसा की चिंगारी ने उन गावों तक को अपनी चपेट में ले लिया जिनमें भाईचारे की मिसाल दी जाती थी। 11 दिनों तक महौल को समझने की प्रशासनिक नाकामी के बीच हिंसा भड़की, तो सीमा पर रक्षा करने वाली सेना को लगाना पड़ा। यह दुर्भाग्य ही है जो सैनिक सीमा पर रक्षा करते हैं उन्हें हमारी निजी व्यवस्था भी संभालनी पड़ती है जाहिर है यह हमारी नाकामी का सुबूत भी है। जाति-धर्म के नाम पर खूनी साजिश में हर सूरत में नुकसान आम आदमी का ही होता है। ऐसे दंगों से लोगों को कुछ हासिल नहीं होता। शायद यह बात बहुत कुछ गंवाने के बाद समझ में आ भी जाती है। नापाक त...
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खूंखार बम एक्सपर्ट टूंडा जैसे कितने गद्दार? मोस्ट वांटेड खूंखार आतंकवादी बम बनाने का एक्सपर्ट अब्दुल करीम उर्फ टूंटा आखिर पकड़ा गया। यह वह हैवान है जिसने देश के कई हिस्सों में आतंकवाद के बीज रोपे। आतंक की पैदाईस में इसका बहुत बड़ा हाथ रहा है। हैरत यह कि रेड कॉर्नर नोटिस के बाद भी यह पहली बार गिरफ्त में आया। पत्रकारिता के सफर में अब्दुल करीम उर्फ टूंडा पर मुझे कई बार लिखने का मौका मिला। हिन्दुस्तान में ही जन्मे इस नापाक गद्दार के इरादे शुरू से ही खतरनाक रहे थे। खून-खराबा, हिंसा उसे पसंद थी। बम बनाते वक्त हुए एक विस्फोट में इसका हाथ उड़ गया तभी नाम टूंडा पड़ा। भारत में सीरियल बम धमाकों के बाद यह बंगलादेश के रास्ते पाकिस्तान भाग गया था। कोई दोराय नहीं कि यदि हिन्दुस्तान में ऐसे हैवान न हो तो पाकिस्तान की औकात इतनी नहीं कि वह हम पर चोट कर सके। कभी चिकित्सक रहे टूंटा का शुरू से ही देश को आतंकवाद की आग में झोंकने का मकसद रहा। चार भाषाओं पर उसकी पकड़ है। गिरफ्तारी के वक्त भी इस आतंकी की नजरों का अंदाज बेहद शातिराना था। 70 साल की उम्र में भी यह भारत की तबाही का ख्वाब देख रहा था। इस शात...
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माफ करना दामिनी! हम भी गुनाहगार हैं! दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी दिल्ली की बस में रूह कंपा देने वाली दरिंदगी का शिकार हुई दामिनी आखिर इस दुनिया से रूखसत हो गई। वह भी तक जब वह जीना चाहती थी। उसने लिखकर कहा था-‘माँ मैं जीना चाहती हूं।’ दुःख व गुस्से का गुबार हर भारतीय के दिल में है। पूरी घटना कोढ़ग्रस्त इंसानियत की ऐसी नंगी हकीकत है, जो हमेशा शर्मसार करती रहेगी। कड़वी हकीकत है कि लड़कियां महफूज नहीं हैं और लोग बेटियां पैदा करने से भी डरते हैं। आबादी के लिहाज से दुनिया में दूसरे नंबर वाले भारत में हालात ज्यादा शर्मनाक हैं। ऐसी घटनाओं पर अरब के सख्त कानून की जरूरत याद आती है। दुनिया में सबसे कम अपराध वहीं होते हैं।  इस हकीकत का स्वीकार कर लेना चाहिए कि ऐसे लोगों को कानून का खौफ नहीं है?  छेड़छाड़ के मामलों में तो देश के अधिकांश हिस्सों में हालात एक जैसे हैं। इस पीड़ा को नजदीक से महसूस करना है, तो उन कामकाजी महिलाओं व लड़कियों से बात करिये जो प्रतिदिन सफर से लेकर कार्यालय तक में मानसिक यंत्रणा सहती हैं। कुंठित मानसिकता वाले उजले चेहरे वाले भी इस मामले में पी...