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बलात्कारी तांत्रिक करोड़ों का वारिस -नाबालिग से लेकर महिलाएं तक होती थीं शिकार,   -अंधभक्तों से कमायी करोड़ों की दौलत -अय्याशी के बाद अबॉर्शन कराने जाता था अस्पताल उजली सीरत वाले 45 साल के उस शख्स को अंधविश्वास में डूबे उसके हजारों भक्त बंगाली बाबा उर्फ नदीम खादिम उर्फ मेहंदी हसन व जावेद आदि नामों से जानते थे। भक्तों की उसके यहां कतारें लगती थीं। यह शख्स इंसान के रूप में हैवानियत की हदों को लांघता था कुछ इस तरह कि इंसानियत भी शर्मसार हो जाये। उसकी गंदी नजरे लड़कियों व रईस घरों की औरतों के जिस्मों को भेदती थीं। तंत्र-मंत्र की आड़ मंे वह अय्याशी का घिनौना खेल खेलता था। मजबूरियों का फायदा उठाकर वह मौत और बर्बादी का खौफ दिखाता था। लड़कियां उसके लिये महज मनोरंजन का साधन थीं। यूं तो इस पापी ने आधा दर्जन से ज्यादा बेगुनाह लड़कियों को नापाक किया, लेकिन बेगैरती की इंतहा देखिए। इस पाखंडी ने अड़चनें दूर करने व तालीम देने के बहाने से एक परिवार को अपने शिकंजे में ले लिया। इस परिवार की तीन सगी बहनों को उसने अनगिनत बार अपनी हवस का शिकार बनाया। सभी बहनें तब से उसका शिकार होती आ रही थीं जबसे वह नाबालिग ...
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दागदार नेताओं का ‘गन’ तंत्र’ यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का ‘गन’ तंत्र है। राजनीति का आरामदायक महल। जो कदम जेल की दहलीज पर होने चाहिए वह लोकसभा व राज्यसभा में चहलकदमी करते हैं। जिन हाथों में जंजीरें होनी चाहिए वह जनसेवक बनकर जनता की तकदीर लिख रहे हैं। उनका अच्छा-बुरा हर कदम कानून व संगीनों के साये में महफूज है। देशी-विदेशी हथियारों से उन्हें बेपनाह मोहब्बत है। कड़वी हकीकत ही सही, लेकिन देश की दागदार व पाक-साफ होती जा रही खादी की सुरक्षा का खर्च 100 करोड़ से भी ज्यादा है। राजनीति में दबंग माफिया, अपराध की दुनिया के बेताज बादशाह, बाहुबली, हिस्ट्रीशीटर, रासुकाधारी व छुटभैये अपराधी भी हैं। उनके खाते में लूट, हत्या, डकैती, बलात्कार जैसे जघन्य अपराध भी दर्ज हैं। सत्ता सबको चाहिए-कैसे भी, किसी भी कीमत पर। मतदान का आगाज व अंत हिंसक होता है। चुनाव आयोग के पसीने भी छूट जाते हैं। चुनावी लाभ के लालच में राजनीति का अपराधीकरण परपंरा बना, परन्तु देश के लिये चुनौती ओर गंभीर समस्या बन गया। डंके की चोट पर कह सकते हैं कि हथकंडों के बीच अपराध, अपराधियों, भ्रष्टाचार और राजनीति में चोली-दामन का साथ है। पं...
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30 साल से जंजीरों में कैद स्वर्ग की एक जिंदगी कश्मीर की वादियां सुकून देने वाली होती हैं, लेकिन चुन्नीलाल की जिंदगी 30 साल से जंजीरों में कैद है। शहतूत के एक पेड़ से भी जैसे उसका अटूट बंध्न हो गया है। मौसम साल दर साल कई रंग बदलता है परन्तु बदनसीबी का पेड़ सदाबहार हो चुका है। कोई ओर होता तो दामन झटक देता, लेकिन चुन्नीलाल की पत्नी वैष्णों ने त्याग, समर्पण ओर मोहब्बत की मिसाल कायम की। पति के अर्द्वविक्षिप्त होने के बाद भी उसने चुन्नीलाल को नहीं छोड़ा। मेहनत मजदूरी करके किसी तरह बच्चों को बड़ा किया ओर उनकी शादियां भी कीं। पति की सेवा करने में भी वह कोई कसर नहीं छोड़ती। चुन्नीलाल को जंजीरों की कैद से आजाद करके वह उसे सेना या आतंकवादियों की गोलियां का शिकार नहीं बनवाना चाहती। वह आजाद घूमा तो किसी का भी शिकार हो सकता है। तमाम मुसीबतों के बीच वैष्णों आज भी अपनी हिम्मत की इबारत लिख रही है- (मनोहर कहानियाँ जुलाई अंक में प्रकाशित रचना के चंद अंश)-’जम्मू-कश्मीर के अधिकांश गांवों के लोग पौ फटते ही जग जाते हैं ओर सूरज ढलने के साथ ही अलसाने लगते हैं और......
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इज्जत ने बनाया बेटी की कोख का कातिल उत्तर प्रदेश में मोहब्बत की दुश्मन कही जाने वाली जुर्म की पथरीली जमीन व प्रेमी युगलों को मारने के लिये बदनाम उत्तर प्रदेष में मु.नगर की सरजमीं पर मानव व दीपिका के बीच एक इंस्टीट्यूट में कोचिंग के दौरान पहले दोस्ती ओर फिर प्यार हो गया। अलग-अलग जाति के चलते परिजनों ने इसका विरोध किया, लेकिन दोनों ने विवाह कर लिया। इसके बाद दीपिका के परिजन उसके दुश्मन बन गए। उसे कड़े इम्तिहान के दौर से गुजरना पड़ा। एमबीए व एयर होस्टेज का कोर्स कर चुकी व एक मल्टीनेशनल कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर की नौकरी कर रही दीपिका की कोख में बीटेक/एमबीए कर चुके व एक्सपोर्ट हाउस में सर्विस कर रहे मानव की मोहब्बत की निशानी पल रही थी। दीपिका के परिजन उसे धोखे से अपने साथ ले गए। उन्होंने मानव के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने का मारपीट करके दबाव बनाया जब वह नहीं मानी, तो एक महिला चिकित्सक से मिलीभगत करके उसे गर्भपात कराने की दवा पिलाकर इंजेक्शन लगवाये गए। हकीकत का भान होते ही वह अस्पताल से भाग गई। मानव ने उसे एक संस्था की मदद से अस्पताल में भर्ती कराया। दो दिन में दीपिका ने बहुत कुछ देखा। अपना माय...
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मौत की दहलीज पर खत्म मोहब्बत का सफर -प्रेम के परिंदे मारकर मिली 5 को फांसी की सजा -हरियाणा कैथल का बहुचर्चित मनोज-बबली हत्याकांड ** मनोज व बबली एक ही गांव के रहने वाले थे। उनका गौत्र भी एक ही था, लेकिन दोनों के जवां दिल एक-दूसरे के लिये धड़के ओर उनके बीच मोहब्बत हो गई। बंदिशों के बावजूद उसमें कोई कमी नहीं आयी। अपनी दुनिया बसाने के लिये दोनों घरों से भाग गए ओर शादी कर ली। परिजन उनके खून के प्यासे बने, तो उन्होंने अदालत से सुरक्षा मांगी। अदालत ने उन्हें सुरक्षा भी दी, लेकिन बबली के परिजनों ने दोनों का चलती बस से अपहरण किया ओर बेहरमी से दोनों को इज्जत की खातिर मौत के घाट उतार दिया। मनोज के परिवार का पंचायत के तुगलकी फरमान पर सामाजिक बहिष्कार हो चुका था बावजूद इसके उन्होंने न्याय की लड़ाई शुरू की। 33 महीने चली अदालत की कार्रवाई के बाद आखिर अदालत ने ऐतिहासिक फैंसला सुनाया ओर प्रेमी युगल के अपहरण के हत्या के आरोपियों में से 5 को सजा-ए-मौत, पंच को उम्र कैद व एक अन्य को भी सजा सुनायी। बदनाम होती खाप पंचायतों को सबक सिखाने का काम पहली बार हो सका परन्तु वह आज भी इस फैंसले के खिलाफ हैं। सजा-ए-म...
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जल्लाद भी खुश हो गया आतंकी  कसाब की फांसी से *आतंकी पर अब तक 36 करोड़ खर्च हुए, *राक्षस को जिंदा रहने का मिलेगा सालों मौका, *1 अरब से ज्यादा हो सकता है दुष्ट पर खर्चा, *जल्लाद बोला सरेआम होनी चाहिए फांसी 166 बेगुनाह लोगों की मौत व 350 को घायल करने का षडयंत्रकारी आरोपी खूंखार आतंकी मोहम्मद अजमल आमिर कसाब को फांसी होने से केवल वही लोग खुश नहीं है जिन्हें उसने कभी न भरने वाले जख्म दिये हैं बल्कि उसे फांसी देने के इंतजार में बैठा देश का इकलौता जल्लाद भी खुश है। उसकी दिली ख्वाहिश है कि वह जालिम दहशतगर्द को बहुत जल्द फांसी पर लटकाकर कुछ सेकेण्ड में ही उसकी सांसों की डोर को तोड़ दे, लेकिन अफसोस! भारत में ऐसी व्यवस्था आतंकवादियों के लिये नहीं है। देश के 70 फीसदी से भी ज्यादा लोग पाकिस्तानी राक्षस या यूं कहंे आतंकवाद की हांडी के सड़े हुए ‘एक चावल’ कसाब को नाम व शक्ल से जानते हैं। इसे विशेष अदालज के माननीय न्यायाधीश एम.एल. तहलियानी देश को आर्थिक चोट हमले से भी मिली ओर कसाब से भी। क्योंकि इस कसाब पर अब तक सरकार के 36 करोड़ रूपये खर्च हो चुके हैं। उसे सुविधाओं के बीच जिंदा रखना मजबूरी जरूर है...
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बंदूक वाले मास्टर जी उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में नरभक्षी गुलदारों, तेंदूओं ओर बाघों का आतंक कोई नई बात नहीं है। बच्चों व बड़ों को वह अपना शिकार बनाते रहते हैं। लखपत सिंह रावत पेशे से शिक्षक थे। उन्हें सपनों में भी बच्चों की चीखें सुनायी देती थीं। वर्ष 2000 में उत्तराखंड का चमोली जिला नरभक्षी गुलदार से आतंकित हुआ, तो बड़े-बड़े शिकारी आये, लेकिन नरभक्षी इतना चालाक हो गया कि दो साल तक वह मारा नहीं जा सका। वह 12 बच्चों का अपना निवाला बना चुका था। तब लखपत सिंह ने सरकार से जिद करके नरभक्षी को मारने का परमिट लेकर कलम थामने वाले हाथ में बंदूक ली और उसे मार गिराया। इस शिक्षक ने मौत से सामना करने के लिये बंदूक थामी तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। अब तक यह शिक्षक उत्तराखंड के चमोली, टिहरी, पौड़ी, चंपावत, बागेश्वर, रूद्रप्रयाग, उत्तरकाशी व देहरादून आदि जिलों में दर्जनों नरभक्षियों को मार चुका है। उन्होंने नरभक्षियों पर शोध भी किया। उनके असामान्य व्यवहार के कारणों को जाना ओर लोगों को बचाव के उपाय भी बताये। लखपत सिंह को आज लोग बंदूक वाले मास्टर के नाम से जानते हैं। (पूर्ण कहानी मनोहर कहानियाँ के अप्रैल...