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गुरुवार, जून 17, 2010

मौत की दहलीज पर खत्म मोहब्बत का सफर
-प्रेम के परिंदे मारकर मिली 5 को फांसी की सजा -हरियाणा कैथल का बहुचर्चित मनोज-बबली हत्याकांड **मनोज व बबली एक ही गांव के रहने वाले थे। उनका गौत्र भी एक ही था, लेकिन दोनों के जवां दिल एक-दूसरे के लिये धड़के ओर उनके बीच मोहब्बत हो गई। बंदिशों के बावजूद उसमें कोई कमी नहीं आयी। अपनी दुनिया बसाने के लिये दोनों घरों से भाग गए ओर शादी कर ली। परिजन उनके खून के प्यासे बने, तो उन्होंने अदालत से सुरक्षा मांगी। अदालत ने उन्हें सुरक्षा भी दी, लेकिन बबली के परिजनों ने दोनों का चलती बस से अपहरण किया ओर बेहरमी से दोनों को इज्जत की खातिर मौत के घाट उतार दिया। मनोज के परिवार का पंचायत के तुगलकी फरमान पर सामाजिक बहिष्कार हो चुका था बावजूद इसके उन्होंने न्याय की लड़ाई शुरू की। 33 महीने चली अदालत की कार्रवाई के बाद आखिर अदालत ने ऐतिहासिक फैंसला सुनाया ओर प्रेमी युगल के अपहरण के हत्या के आरोपियों में से 5 को सजा-ए-मौत, पंच को उम्र कैद व एक अन्य को भी सजा सुनायी। बदनाम होती खाप पंचायतों को सबक सिखाने का काम पहली बार हो सका परन्तु वह आज भी इस फैंसले के खिलाफ हैं। सजा-ए-मौत पाने वालों में बबली का भाई, मामा, ममेरे भाई व चाचा हैं। सवाल आज भी कायम है क्या इससे उनकी इज्जत बची? वैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा व राजस्थान जैसे इलाकों में मोहब्बत का सफर मौत की दहलीज पर जाकर ही खत्म होता है। पुरातन मान्यताओं को यहां सख्ती से पालन होता है, सामाजिक व्यवस्था भी ऐसी है कि युवाओं को इसकी इजाजत नहीं है। कानून व पंचायतों के बीच एक जंग दशकों से चली आ रही है। (मनोहर कहानियाँ, मई,2010 अंक में प्रकाशित कहानी के संपादित अंश) 30 मार्च,2010 की सुबह लगभग दस बजे थे। उस वक्त हरियाणा के करनाल जनपद में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश वाणी गोपाल शर्मा की अदालत के बाहर लोगों की भारी भीड़ जमा होने लगी थी...