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सोमवार, नवंबर 30, 2009

भयानक कत्ल का क्रूर सिलसिला....
**पत्रकारिता में कितने मोके आते है जब हम कुछ ख़बरों पर ये भी सोचते है कि काश ये किसी के साथ दोबारा न हो. अब जरा इस फोटो को देखीये . ये एक अजन्मी संतान है. बड़ी ही बेरहमी से इसका सिर और हाथ धड़ से काटकर जुदा कर देये गए. यकीं करता हू ये तस्वीर आपके लिये दुर्लभ होगी. ये नंगी हकीकत है संवेदनहीन हो चुके लोगों कि. काश मुर्दा हो चुकी सम्वेदनावों मे किसी तरह जान आ जाये. देश के हर शहर मे अजन्मी संतानों की वातानाकूलित कत्तलगाह बनी है. कत्ल करने वाले भी डिग्रीधारी है. जिन्हें कथित भागवान भी कहा जाता है. मगर अफ़सोस उन पर लगाम नहीं लग पा रही. लगे भी कैसे जब क्रूर इंसान खुद ही जाकर कह रहा है कि मेरे अंश को कत्ल करो. वेसे किसी के लिये इसे शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता. मासूमों का कत्ल रोकने के नाम पर दर्जनों सरकारी अभियान फाइलों मे चल रहे है. कुछ सामजिक संघठन बेटी बचावो अभियान के नाम पर सरकारी धन डकार रहे है. चंद सिक्कों कि खनक पर होने वाली मोतों का खेल क्या कभी रुक पायेगा? ये कहना बहुत मुश्किल है. अफ़सोस और हेरानी है इस कोढ़ग्रस्त इंसानयत पर. *--नितिन सबरंगी

शुक्रवार, नवंबर 27, 2009

खतरनाक मंसूबा तो नहीं था ना_पाक के राणा का?
अमरीका में गिरफ्तार खुंकार आतंकवादी संगठन लश्कर- ए- तयबा का पाकिस्तानी मूल का कनेडियन नागरिक आतंकवादी तहवुर राणा जरायम के लिये बदनाम हो रहे पश्चेमी उत्तर प्रदेश के जनपद मेरठ भी आया था. ये राजफास होते ही हमेशा की तरह देर से जागने वाले खुफिया विभागों के कान खड़े हो गए है. इतना ही नहीं वह अपनी पत्नी समराज अख्थर के साथ हापुड़ और आगरा भी गया था. उसने अपनी नापाक नीगाहों से खूबसूरती की मिसाल ताज को देखा. तहवुर राणा आगरा के होटल वीरेन इंटरनेशनल के रूम नंबर १०१ में ४ लोगों के साथ रुका था. आगरा के डीआइजी आदित्त्ये मिश्रा भी इसकी पुष्टि करते है. नेशनल इन्वेस्तीगेसन एजेंसी और ए.टी.एस मेरठ और आगरा में डेरा डालकर जाँच में लगी है. मुंबई हमलो से पहले लश्कर आतंकी हेडली को मेरठ से मेल किये जाने का भी पता चला है. लेकिन उसको मेल करने वाला कोन था और उसका मकसद क्या था इसका अभी पता नहीं चल रहा है. साइबर अपराध से जुड़े लोग जाच कर रहे है. वसे आतंकवादियो से मेरठ का रिस्ता कोई नया नहीं है. सालों पहले इसकी नीव अब्दुल करीम और सलीम पतला ने डाल दी थी एन दोनों को ही आज तक पकड़ा नहीं जा सका है. उनके पाकिस्तान में होने की सम्भावना जताई जा रही है. आतंकवादी आते है और आराम से चले जाते है. देश में कही भी आतंकवादी घटना हो उसके तार पश्चेमी उत्तर प्रदेश से जरूर जुडते है. पश्चिम के कई जिलों मे आतंकवादिओं का गहरा नाता है. साल में आधा दर्जन से भी अधिक आतंकवादिओं की गिरफ्तारी अक्सर चोकाती है. आतंकवादिओं की सक्रियता पर अंकुश लग पायेगा एसा संभव नहीं लगता. तहवुर राणा जेसा आतंकी आया और चला गया उस जेसे न जाने कितने आते है. ये अलग बात है की पता ही नहीं चलता. खतरनाक बात ये है की तहवुर राणा का आखिर मेरठ और आगरा जाने का मकसद क्या था. **नितिन सबरंगी
खतरनाक आगाज है या खतरनाक अंत ?
* निर्दोष छात्र को पुलिस ने मुठभेड़ में मारा.
* नाबालिग़ लड़की को सरेआम बाल पकड़कर घसीटा.
* दसवी के छात्र का जुलुस निकाला.
* पुलिस की पिटाई से त्रस्त युवक ने जहर खाया. दरअसल ये चंद घटनाएँ पुलिस की तालिबानी हरकतों का आइना भर है. अंग्रेजो ने भारत की जनता पर जुल्म करने के लिये जो फोर्स बनाई थी उसकी मानसिकता अभी तक नहीं बदली. पुलिस डंडे के बल पर जनता को नचाना चाहती है. थानों मे उसकी अपनी हुकूमत चलती है. नेनीताल मे हुई घटना इस बात का सबूत है की जब जुल्म हदों को लाँघ जाता है तो जनता का गुस्सा कुछ इसी तरह निकलता है. ये बड़े खतरे का संकेत भी है. जनता और पुलिस के बीच बनी खाई भरने वाली नहीं है. कियोकी पुलिस अपने आचरण मे सुधार ही नहीं लाना चाहती. सवाल ये है की खुद कानून के रखवाले कानून का कितना पालन करते है? थाने मे हत्या हो जाना कोई मजाक नहीं है. इसमे कोई दोराय नहीं उत्तराखंड की जनता उत्पातों की अदि नहीं है. ये गुस्सा कोई एक दिन या साल का नहीं था. बल्कि उसके अन्दर एक गुबार एकत्र हो रहा था. ये खतरनाक आगाज है या खतरनाक अंत कहा नहीं जा सकता. इतना जरूर है की पुलिस को मनवाधिकार का पाठ ठीक से पढ़कर अपने आचरण मे सुधार लाने की देसा मे आगे बढ़ना चाहीये. सफेदपोश भी बयानबाजी और पुलिस को अपनी खानदानी विरासत समझने से बाज आये तो शायद कुछ भला हो जाये. घटना मे मारे गए पुलिसकर्मी के परिजनों को सरकार को मुआवजा देकर अपनी सवेदना जतानी चाहीये. - नितिन सबरंगी

बुधवार, नवंबर 04, 2009

...और बीमार हो गए मधु कोड़ा

झारखण्ड के पूर्व सीएम मधु कोडा की काली कमाई का किला गिर चुका है. इनकम टेक्स खुद भी मन रहा है की उनकी कमाई का किला ४००० करोर का हो सकता है. कमाल ही कर डाला जनाब ने. इतनी रकम मे झारखण्ड का तो विकाश होता ही दूसरो का भी भला हो जाता? अब जनाब पेट दर्द का बहाना कर अस्पताल मे भारती है. बोलने वालो को कोन रोके जो कह रहे है कि जिसका हाजमा इतना तगड़ा हो वो भला पेट दर्द का शिकार केसे हो सकता है? वेसे उनका आवाश तो अभी इनकम टेक्स ने ही कब्जा रखा है. ऊपर से अधिकारी सिर दर्द कर रहे है. आगे का तनाव अलग है. तो गिर इससे अछा तो पेट दर्द ही है. यकीनन यदि काली कमाई वालों के लिये कोई बड़ा पुरुस्कार होता तो कोडा साहब भी उसके हक़दार होते. वर्ना वो सर्त लगाते कि बोल कोन कितना बड़ा........जो हो रहा है उससे उनकी पत्नी गीता जरूर परेशान है. कोडा कि मण्डली पर भी इनकम टेक्स ने अपनी नजरे गडा दी है. बहरहाल झारखण्ड के जीतने अधिकारियो पर भी अवैध कमाई के मामले चल रहे हो उनको माफ़ कर देना ज़यादा ठीक है कयोकि यहाँ तो पूरी दाल ही काली है. झारखण्ड के इतिहास मे इन सर्मनाक और काले दिनों को कभी भुलाया नहीं जा सकता.