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शुक्रवार, नवंबर 27, 2009

खतरनाक आगाज है या खतरनाक अंत ?
* निर्दोष छात्र को पुलिस ने मुठभेड़ में मारा.
* नाबालिग़ लड़की को सरेआम बाल पकड़कर घसीटा.
* दसवी के छात्र का जुलुस निकाला.
* पुलिस की पिटाई से त्रस्त युवक ने जहर खाया. दरअसल ये चंद घटनाएँ पुलिस की तालिबानी हरकतों का आइना भर है. अंग्रेजो ने भारत की जनता पर जुल्म करने के लिये जो फोर्स बनाई थी उसकी मानसिकता अभी तक नहीं बदली. पुलिस डंडे के बल पर जनता को नचाना चाहती है. थानों मे उसकी अपनी हुकूमत चलती है. नेनीताल मे हुई घटना इस बात का सबूत है की जब जुल्म हदों को लाँघ जाता है तो जनता का गुस्सा कुछ इसी तरह निकलता है. ये बड़े खतरे का संकेत भी है. जनता और पुलिस के बीच बनी खाई भरने वाली नहीं है. कियोकी पुलिस अपने आचरण मे सुधार ही नहीं लाना चाहती. सवाल ये है की खुद कानून के रखवाले कानून का कितना पालन करते है? थाने मे हत्या हो जाना कोई मजाक नहीं है. इसमे कोई दोराय नहीं उत्तराखंड की जनता उत्पातों की अदि नहीं है. ये गुस्सा कोई एक दिन या साल का नहीं था. बल्कि उसके अन्दर एक गुबार एकत्र हो रहा था. ये खतरनाक आगाज है या खतरनाक अंत कहा नहीं जा सकता. इतना जरूर है की पुलिस को मनवाधिकार का पाठ ठीक से पढ़कर अपने आचरण मे सुधार लाने की देसा मे आगे बढ़ना चाहीये. सफेदपोश भी बयानबाजी और पुलिस को अपनी खानदानी विरासत समझने से बाज आये तो शायद कुछ भला हो जाये. घटना मे मारे गए पुलिसकर्मी के परिजनों को सरकार को मुआवजा देकर अपनी सवेदना जतानी चाहीये. - नितिन सबरंगी

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