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सोमवार, अगस्त 28, 2017

पाखंडी गुरमीत और उसका गुडातंत्र

-नितिन शर्मा ‘सबरंगी’
कथित बाबा के तौर पर खुद को पेश करने वाले गुरमीत सिंह को माननीय अदालत द्वारा दोषी ठहराये जाने के बाद प्रमुख रूप से पंजाब व हरियाणा में हुई खूनी हिंसा ने न सिर्फ सरकारी तंत्र की पोल खोली बल्कि पहले की तरह एक बार फिर साफ हो गया कि इस तरह के पाखंडियों से लगाव रखने वाला अंधश्रृद्वा वाला भीड़तंत्र समाज के लिए किस तरह खतरा साबित होता हैं। मनमानी और खुद को कानून से ऊपर समझने के गुरूर ने राम रहीम को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। इस सबके बीच करोड़ों रूपये की सरकारी गैरसरकारी संपत्ति का नुकसान तो हुआ ही लोगों की जानें भी गईं। जिंदगी ठहर सी गई, बस व रेल मार्ग अवरूद्व हो गए, लोग बिजली पानी से महरूम हुए, स्कूल कॉलेज बंद हुए और तमाम परेशानियों से इसलिए रूबरू होना पड़ा, क्योंकि भीड़तंत्र ने कुछ समय के लिए व्यवस्था को अपाहिज कर दिया। बावजूद इसके तारीफ करनी होगी उस दुराचार पीड़िता की जिसने अकूत दौलत व ताकत के बाजीगर के खिलाफ इंसाफ की अवाज बुलंद की। इसके लिए उसे तमाम धमकियों और दुश्वारियों का सामना करना पड़ा। अदालत के फैसले ने इंसाफ के प्रति आम आदमी के विश्वास को और भी मजबूत किया और न्यायाधीश ने भीड़ के दम पर अपनी ताकत का अहसास कराने वाले शख्स को दोषी करार दिया। इससे इंसाफ की उम्मीद बंधी है। न्यायिक प्रणली इतनी कमजोर नहीं जो पाखंडियों पर नकेल न कस सके। आमतौर पर आरोपों का शिकार होने वाली सीबीआई ने अपना काम ईमानदारी से किया, क्योंकि व्यवस्था का हर सिक्का यदि बिकाऊ और दबाव का शिकार होता, तो बाबा शायद ही जेल पहुंचता। इसकी सराहना की जानी चाहिए। एक बाबा वर्षों से व्यवस्था को कठपुतली बनाकर अपनी उंगलियों के इशारे पर नचा रहा था। वह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र वाले देश की संवैधानिक व्यवस्था को नकारने  और अपनी हुकूमत बढाने का मंसूबा रखता था।
लोगों को यह समझना चाहिए कि जो दूसरों को मोह माया से दूर रहने के उपदेश देकर खुद ऐशपरस्त जिंदगी में मौज ले रहा हो, तो वह भला कैसे आदर्श उदाहरण हो सकता है। जो संस्कृति, समाज और देश के लिए ही खतरा बन जाए वह किस प्रकार का धार्मिक गुरू होगा। वास्तव में लोगों की आस्था और धर्म की आड़ में ऐसे पाखंडी जनता को दोनों हाथों से लूटते हैं। जरूरत पड़ने पर इसी भीड़ को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं जिसकी कीमत भीड़ और समाज दोनों को चुकानी पड़ती है। #रामहीम, #बाबा, #सच्चासौदा, #अदालत, #कानून, #साध्वी, #पत्रकार, #सजा, #धनधनसतगुरू, #गुरमीत, #हिंसा, 

गुरुवार, अगस्त 03, 2017

चोटीकटवा, मंकी मैन और मुंहनुचवा.....
-नितिन शर्मा ‘सबरंगी’

देश के चार राज्यों में एक अफवाह चोटीकटवा ने आतंक की तरह काम किया। महिलाओं व लड़कियों के चोटी कटने के मामले तेजी से सामने आये। यह चोटी काटता कौन है? यह रहस्य है, लेकिन इसने सभी के होश उड़ा दिए। अफवाह ने खतरनाक रूप लिया और उन्माद फैलने लगा। आगरा में लोगों ने एक महिला को डायन बताकर लाठी डंडों से पीटकर मार डाला। यह समाज को कलंकित करती घटना है। दरअसल शहरी व देहात इलाकों में महिलाओं व लड़कियों की चोटी काटने के मामले प्रकाश में आये। कटी चोटियां हाथ में होती हैं इसलिए घटनाओं को पूरी तरह झुठलाया भी नहीं जा सकता। चोटी कटने के पीछे तरह-तरह के दावे और अफवाहें हैं। हैरत भरे किस्से रहस्य से परिपूर्ण और रोमांचक जरूर हैं। वैज्ञानिक इसे अंधविश्वास और मनोविज्ञानी बीमारी बताते हैं। असामाजिक तत्वों की करतूत भी इसे बताया जा रहा है। पुलिस कुछ कहने की स्थिति में नहीं है। इससे पहले वर्ष 2001 में मंकीमैन ने खूब दहशरत फैलाई। इसके बाद मुंहनोचवा आ गया। हैरानी की बात यह है कि किसी का भी कभी ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आया। समय के साथ ऐसी घटनाएं और किस्से थम जाते हैं। अफवाहें कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बन जाती हैं। चोटीकटवा से जादू टोना व तंत्रमंत्र करने वालों की दुकानें जरूर आबाद हो गई हैं। ऐसी घटनाओं की जड़े तलाशकर उन्माद न फैले इसके उपाय करने होंगे, क्योंकि अफवाहें तबाही का काम करती हैं।

शनिवार, मई 06, 2017

निर्भया केस समाज को भी सबक जरूरी
-देवकी शर्मा
देश के बहुचर्चित व वीभत्स निर्भया दुराचार कांड में 5 मई, 2017 को सर्वाेच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट के बाहुबली फैसले के साथ बेटी के दर्द को बेहद करीब से महसूस करने वाले पीड़िता के उन माता पिता की भी तारीफ होनी चाहिए जो इंसाफ की आस में टकटकी लगाये हौंसले व हिम्मत से दुश्वारियों के बीच डटे रहे। तीन जजों की बेंच जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस भानुमति और जस्टिस अशोक भूषण ने घृणित अपराध को न सिर्फ सदमे की सुनामी बताया. बल्कि कहां की इस मामले में कोई रियायत नहीं दी जा सकती। जिस तरह से अपराध हुआ है वह एक अलग दुनिया की कहानी लगती है।
 जो कुछ निर्भया के साथ हुआ वह किसी सभ्य समाज की हकीकत, तो नहीं था। यकीनन ऐसे फैसलों से बेटियों को शिकार बनाने वाले हैवानों में डर पैदा होगा. बलात्कार, छेड़छाड़, यौन उत्पीड़न, महिला अत्याचार, लिंगभेद या फिर यौन शोषण चाहे जो नाम दीजिए महिलाओं व लड़कियों को ही इसका सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति हर किसी के लिए चिंताजनक है। बड़ा सवाल भी है कि ऐसे लोगों को तब अपनी मां, बहन और बेटी का ख्याल क्यों नहीं आता, जब वह किसी को अपनी हवस का शिकार बना रहे होते हैं। समाज को भी ऐसे लोगों को बहिष्कृत कर देना चाहिए। बेटियां यौन उत्पीड़न की शिकार होती हैं। नर भेड़िये उन्हें अपना शिकार बनाते हैं। घर से लेकर स्कूल, स्कूल से लेकर ट्यूशन तक उन्हें गंदी नजरों का शिकार होना पड़ता है। बेटियों वाले मातापिता चिंतित रहें, तो यह फिक्र की बात तो है ही, सामाजिक व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल भी। बेटियों की सुरक्षा और उनकी परवाह को लेकर समाज को जागरूक तो होना ही पड़ेगा, क्योंकि पुलिस और अदालत का काम अपराध घटित होने के बाद का होता है। उससे पहले ही बचाव और मानसिकता में बदलाव आये, तो ऐसी नौबत न आये। अदालत के फैसले को नजीर होते हैं। उसमें सबक है कि घिनौने अपराध करने वालों से सख्ती से निपटा जायेगा। ऐसे फैसलों से सबक लिया जाना चाहिए।