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रविवार, अक्तूबर 18, 2015

इंद्राणी एक खूबसूरत शातिर औरत
-नितिन शर्मा ‘सबरंगी’
अर्श से फर्श पर गिरकर कैसी तड़प होती है? इस हकीकत को सलाखों के पीछे अपने ही बुने जाल में फंसी इंद्राणी से बेहतर शायद ही कोई दूसरा बता पाए। जेल की जिंदगी उसे कांटे की तरह चुभ रही है और वह बाहर निकलने के लिए छटपटा रही है। इंद्राणी मुखर्जी कभी गुवाहटी की एक मामूली लड़की हुआ करती थी। वह आधुनिकता की अंधी दौड़ में शरीक होने का ख्वाब देखती थी। ऐसे ही ख्वाब ने उसे अति महत्वाकांक्षी बना दिया। उसने नारी सीमाओं को ताक पर रखा ओर रिश्तों के अजीब जाल में उलझती चली गई। उसकी किस्मत के सितारे बुलन्दी पर पहुंचे, तो एक दिन इंद्राणी मीडिया जगत की नामी हस्ती बन चुकी थी। दौलत उसके कदम चूमती थी ओर वह दुनिया की 50 पावरफुल महिलाओ की सूची में शामिल थी। शोहरत व दौलत के शिखर पहुंचकर संतुलन बनाए रखना हर किसी के वश में नहीं होता। इंद्राणी पर भी दौलत व शोहरत का ऐसा नशा हावी हुआ कि वह सुधुबुध खो बैठी। उसने एक बड़ा गुनाह करके राज को ही दफन कर दिया, लेकिन राजदार रहा शख्स उसका ड्राइवर श्यामराय हथियार तस्करी मामले में पुलिस पकड़ा गया, तो उसने ऐ
सा राजफाश किया जिसने पूरे देश में तहलका मचा दिया। मुंबई की खार पुलिस ने इंद्राणी को गिरफ्तार कर लिया। दरअसल उजले चेहरे वाली इन्द्राणी ने अपनी 22 साल की खूबसूरत बेटी शीना का कत्ल कर उसे बेहद शतिराना अंदाज में दफना दिया था। उसने मां-बेटी के खूबसूरत रिश्ते का भयानक अंत कर दिया था। मुंबई पुलिस आयुक्त राकेश मारिया ने केस को चुनौती की तरह लिया। जेल में बंद इंद्राणी ने अपने गुनाह से न केवल नारी की छवि पर ही सवाल खड़े कर दिए बल्कि सनसनीखेज दास्तान का काला पन्ना भी बन गई। सलाखों की जिंदगी अब उसे बोझिल लगी रही है। यकीनन कभी उसने ऐसा सोचा होता, तो ऐसी नौबत नहीं आती।

शनिवार, अक्तूबर 03, 2015

अफशां एक खतरनाक औरत
-नितिन शर्मा ‘सबरंगी’ 
नामः अफशां जबीन उर्फ निकी जोसेफए उम्ररू 37 साल।
गुनाहः आतंकी संगठन में भर्ती के लिए युवकों को उकसाना। 
अंजामः जेल की सलाखों के पीछे। जी हा! फोटो में दिख रही इस महिला का प्रोफाईल कुछ ऐसा ही है। आइएस की पहली भारतीय एजेंट खतरनाक इरादों की वारिस अफशां फेसबुक के जरिए नौजवान युवकों को फंसाने का जाल बिछाती थी ओर उन्हें सीरिया ओर इराक में जड़े जमा चुके खूंखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ;आइएसद्ध के लिए जिहादी बनाकर भर्ती कराती थी। वह न सिर्फ ऑनला
इन भर्ती कर रही थी बल्कि आइएस के खूंखार इरादों ओर कारनामों का प्रचार भी करती थी। झूठे ढंग से खुद को ब्रिटिश नागरिक बताने वाली अफशां हैदराबाद की रहने वाली थी। उसने इंटर आबूधाबी से किया ओर पुनः इंडिया आ गई। बाकी पढ़ायी कर वह यूएई चली गई। दुबई भी उसका ठिकाना था। अफशां खुफिया एजेंसियों के रडार पर तब आयी जब आतंकी संगठन के लिए काम करने वाले अमेरिका से आए एक इंजीनियर सलमान को हैदराबाद एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया गया। उसने ही अफशां के कारनामें बताये। उसे संयुक्त अरब अमीरात से प्रत्यर्पित कर गिरफ्तार किया गया। इन्वेस्टीगेशन एजेंसीज की पूछताछ के बाद यह महिला सलाखों के पीछे अपने गुनाहों की तौबा कर रही है।
अंजानों पर न करें विश्वास
-नितिन शर्मा ‘सबरंगी’
दिल्ली में रह रहे ग्राफिक डिजाइनर अभिजीत व उसकी चित्रकार दोस्त आर्ट टीचर मोमिता समुंद्र तल से 6730 फुट की ऊंचाई पर बसे उत्तराखंड के प्रमुख लोकप्रिय पर्यटन स्थल चकराता घूमने गए। वहां उनकी मुलाकात एक टैक्सी चालक से हुई। दोनों उस पर विश्वास करके वह ऐसी भूल कर बैठे जिसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। आर्थिक रूप से सम्पन्न दास दंपत्ति की 28 वर्षीय बेटी मोमिता केरियर बनाने के लिये दिल्ली गई। वहां उसकी दोस्ती चित्रकार अभिजील पॉल से हो गई। दोनों के शौक एक जैसे थे। लिहाजा उनकी दोस्ती प्यार में बदल गई। मोमिता को प्राकृतिक सौन्दर्य से प्यार था। वह फोटोग्राफी के लिए घूमा करती थी। एक सुबह उसने पिता को फोन करके बताया,

‘‘पापा मैं आज उत्तराखंड के चकराता जा रही हू।’’

‘‘क्यों?’’
‘‘बस घूमने ओर अच्छे फोटोग्राफ के लिये।’’
‘‘अकेली जाओगी?’’
‘‘नहीं पापा मेरे साथ अभिजीत है।’’ एक दिन बाद सब परेशान हो गए जब मोमिता का फोन नहीं मिला। उन्होंने उसकी गुमशुदगी दर्ज करा दी। दिल्ली पुलिस टीम उत्तराखंड गई। उत्तराखंड पुलिस ने जांच की। मोमिता के मोबाइल की अंतिम लोकेशन चकराता पायी गई। मोमिता ने एक स्थानीय नंबर पर भी अंतिम बार बात की थीं। डीआईजी संजय गुंज्याल के निर्देशन में पुलिस ने उस नंबर की जांच करायी जिस पर मोमिता की बात हुई थीं। वह नंबर एक टैक्सी चालक राजू का निकला। उससे सख्ती से पूछताछ हुई, तो उसने जो राज खोला वह शर्मसार करने वाला था। बुरी लतों का शिकार व शॉर्टकट से अमीर बनने का सपना देखने वाले राजू ने 3 दोस्तों के साथ दोनों की हत्या कर दी थी। 
टैक्सी में अभिजीत व मोमिता की बातचीत, पहनावा देखकर उसने अंदाजा लगाया कि दोनों ही अमीर हैं। उसने उन्हें लूटने की ठान ली। दोनों कला प्रेमी थे। चालाकियों से उनका वास्ता नहीं था इसलिए भरोसा कर लिया। तीनों ने मोमिता के साथ छेड़छाड़ की, विरोध पर जीप में पड़ी रस्सी निकालकर पहले अभिजीत का गला दबाया फिर मोमिता की भी दुपट्टे से गला दबाकर हत्या कर दी। मरने से पहले मोमिता बहुत गिड़गिड़ाई, लेकिन किसी को भी उस पर दया नहीं आयी। उनका सामान लूटकर दोनों के शव अलग-अलग फेंक दिए गए। विवेचनाधिकारी ठाकुर सिंह रावत ने आरोपियों के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर दिया है। मोमिता व अभिजीत ने राजू पर अधिक विश्वास न किया होता, तो वह आज जिंदा होते।

बुधवार, अगस्त 12, 2015

लिफ्ट का बहाना कहीं लुट न
जाना
अगर आप राष्ट्रीय राजमार्गों पर अपने या अनजान वाहनों से सफर करते हैं और लिफ्ट लेने या देने में यकीन रखते हैं तो सावधान हो जाइए. क्योंकि इन दिनों राह चलते लूटमारी करने वाले गैंग विविध वेशों और परिस्थितियों में आप को लूट या हत्या का शिकार बनाने के लिए मंडरा रहे हैं. आप घर से दफ्तर, किसी टूर या अन्य काम से निकलते हैं तो घर सुरक्षित वापस आ जाएंगे या किसी अनहोनी का शिकार नहीं होंगे, इस बात की कोई गारंटी नहीं. वाहन नहीं है तो हो सकता है रास्ते में कहीं लिफ्ट लें और यदि वाहन है तो हो सकता है दयाभाव मन में आए और आप किसी को लिफ्ट दे दें लेकिन लिफ्ट का चक्कर कई बार माल और जान दोनों पर भारी पड़ जाता है. राहजनी करने वालों की गिद्ध दृष्टि सड़कों पर शिकार तलाशती रहती है और आप को पता भी नहीं चलता. जो जाल में फंसता है उसे कोई नहीं बचा सकता.
राष्ट्रीय राजमार्गों पर ऐसे कई खतरनाक गिरोह सक्रिय हैं जो लिफ्ट दे कर लोगों को लूटते हैं. मामूली लालच में वे हत्या करने से भी नहीं चूकते. चारपहिया वाहन चालकों से लिफ्ट लेने में भी ये माहिर खिलाड़ी होते हैं. वाहन चालक झांसे में आ जाए, इस के लिए वे अपने साथ महिला व बच्चों को भी रखते हैं. लूटने वालों ने अनोखे तरीके ईजाद किए हुए हैं. अनजाने में लोग इन के शिकार हो जाते हैं.

सोमवार, जुलाई 27, 2015

क्योंकि अब्दुल कलाम निर्विवाद इंसान थे!
-नितिन शर्मा ‘सबरंगी’
देश के 11 वें राष्ट्रपति मिसाइलमैन डॉ0 ए0पी0जे0 अब्दुल कलाम को यकीनन कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्हें देश के लोग इसलिए भी ज्यादा पसंद करते थे क्योंकि उनके विचार जाति-धर्म से ऊंचे थे और वह निर्विवाद थे। वह इस बात की मिसाल भी थे कि एक मामूली गरीब परिवार से किस तरह उन्होंने बुलन्दियों को छुआ। ऐसे लोग कम ही होते हैं जो हौंसलों की उड़ान इस तरह भरते हैं। 
18 जुलाई, 2002 को डॉक्टर कलाम को नब्बे प्रतिशत बहुमत द्वारा 'भारत का राष्ट्रपति' चुना गया था और इन्हें 25 जुलाई 2002 को संसद भवन के अशोक कक्ष में राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई गई। इस संक्षिप्त समारोह में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, उनके मंत्रिमंडल के सदस्य तथा अधिकारीगण उपस्थित थे। इनका कार्याकाल 25 जुलाई 2007 को समाप्त हुआ।
भारत के अब तक के सर्वाधिक लोकप्रिय व चहेते राष्ट्रपतियों में से एक डॉ. अबुल पाकिर जैनुलआब्दीन अब्दुल कलाम ने तमिलनाडु के एक छोटे से तटीय शहर रामेश्वरम में अखबार बेचने से लेकर भारत के राष्ट्रपति पद तक का लंबा सफर तय किया है। पूर्व राष्ट्रपति
अवुल पकिर जैनुल्लाब्दीन अब्दुल कलाम को पूरा देश एपीजे अब्दुल कलाम के नाम से जानता था। वैज्ञानिक और इंजीनियर कलाम ने 2002 से 2007 तक 11वें राष्ट्रपति के रूप में देश की सेवा की। मिसाइल मैन के रूप में प्रसिद्ध क
लाम देश की प्रगति और विकास से जुड़े विचारों से भरे व्यक्ति थे।एपीजे अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ। पेशे से नाविक कलाम के पिता ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे। ये मछुआरों को नाव किराये पर दिया करते थे। पांच भाई और पांच बहनों वाले परिवार को चलाने के लिए पिता के पैसे कम पड़ जाते थे इसलिए शुरुआती शिक्षा जारी रखने के लिए कलाम को अखबार बेचने का काम भी करना पड़ा। आठ साल की उम्र से ही कलाम सुबह 4 बचे उठते थे और नहाकर गणित की पढ़ाई करने चले जाते थे। सुबह नहाकर जाने के पीछे कारण यह था कि प्रत्येक साल पांच बच्चों को मुफ्त में गणित पढ़ाने वाले उनके टीचर बिना नहाए आए बच्चों को नहीं पढ़ाते थे। ट्यूशन से आने के बाद वो नमाज पढ़ते और इसके बाद वो सुबह आठ बजे तक रामेश्वरम रेलवे स्टेशन और बस अड्डे पर न्यूज पेपर बांटते थे।
कलाम ‘एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी’ में आने के पीछे अपनी पांचवी क्लास के टीचर सुब्रह्मण्यम अय्यर को बताते थे। वो कहते हैं, ‘वो हमारे अच्छे टीचर्स में से थे। एक बार उन्होंने क्लास में पूछा कि चिड़िया कैसे उड़ती है? क्लास के किसी छात्र ने इसका उत्तर नहीं दिया तो अगले दिन वो सभी बच्चों को समुद्र के किनारे ले गए, वहां कई पक्षी उड़ रहे थे। कुछ समुद्र किनारे उतर रहे थे तो कुछ बैठे थे, वहां उन्होंने हमें पक्षी के उड़ने के पीछे के कारण को समझाया, साथ ही पक्षियों के शरीर की बनावट को भी विस्तार पूर्वक बताया जो उड़ने में सहायक होता है। उनके द्वारा समझाई गई ये बातें मेरे अंदर इस कदर समा गई कि मुझे हमेशा महसूस होने लगा कि मैं रामेश्वरम के समुद्र तट पर हूं और उस दिन की घटना ने मुझे जिंदगी का लक्ष्य निर्धारित करने की प्रेरणा दी। बाद में मैंने तय किया कि उड़ान की दिशा में ही अपना करियर बनाऊं। मैंने बाद में फिजिक्स की पढ़ाई की और मद्रास इंजीनियरिंग कॉलेज से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में पढ़ाई की।’
1962 में कलाम इसरो में पहुंचे। इन्हीं के प्रोजेक्ट डायरेक्टर रहते भारत ने अपना पहला स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान एसएलवी-3 बनाया। 1980 में रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा के समीप स्थापित किया गया और भारत अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष क्लब का सदस्य बन गया। कलाम ने इसके बाद स्वदेशी गाइडेड मिसाइल को डिजाइन किया। उन्होंने अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइलें भारतीय तकनीक से बनाईं। 1992 से 1999 तक कलाम रक्षा मंत्री के रक्षा सलाहकार भी रहे। इस दौरान वाजपेयी सरकार ने पोखरण में दूसरी बार न्यूक्लियर टेस्ट भी किए और भारत परमाणु हथियार बनाने वाले देशों में शामिल हो गया। कलाम ने विजन 2020 दिया। इसके तहत कलाम ने भारत को विज्ञान के क्षेत्र में तरक्की के जरिए 2020 तक अत्याधुनिक करने की खास सोच दी गई। कलाम भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार भी रहे।

1982 में कलाम को डीआरडीएल (डिफेंस रिसर्च डेवलपमेंट लेबोरेट्री) का डायरेक्टर बनाया गया। उसी दौरान अन्ना यूनिवर्सिटी ने उन्हें डॉक्टर की उपाधि से सम्मानित किया। कलाम ने तब रक्षामंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. वीएस अरुणाचलम के साथ इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (आईजीएमडीपी) का प्रस्ताव तैयार किया। स्वदेशी मिसाइलों के विकास के लिए कलाम की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई।

शुक्रवार, मई 22, 2015

शबनम तुम्हें फांसी जरूरी है!
-नितिन शर्मा ‘सबरंगी’
‘शबनम ओर उसके प्रेमी सलीम के हक में मौत की सजा मुकर्रर की जाती है। इन दोनों को तब तक फांसी पर लटकाया जाये जब तक इनकी मौत न हो जाए’ कुछ इसी तरह न्यायाधीश ने एक डबल एमए युवती शबनम और उसके प्रेमी के हक में फांसी की सजा पर मुहर लगा दी। दरअसल शबनम उत्तर प्रदेश के जनपद मुरादाबाद के समीपवर्ती जनपद अमरोहा के बामनहेड़ी गांव की रहने वाली थी। वह नजदीक ही रहने वाले एक लड़के समीम से प्रेम करती थी। शबनम के पिता पेशे से शिक्षक थे। उन्होंने अपने
बच्चों को भी ऐसी ही तालीम दी। नतीजन दो बेटे इंजीनियर बन गए जबकि शबनम डबल एमए करके शिक्षा मित्र बन गई। शबनम अपनी मर्जी से निकाह करना चाहती थी और पिता की पूरी प्रापॅर्टी पर अपना हक भी। परिवार के जिंदा रहते यह मुमकिन नहीं लिहाजा वर्ष 2005 में एक रात उसने व उसके प्रेमी ने कुल्हाड़ी से गले काटकर अध्यापक पिता, माँ, इंजीनियर भाई, दूसरे भाई, भाभी, मासूम भतीजे व एक रिश्तेदार लड़की का कत्ल किया। पूरे परिवार में सिर्फ शबनम ही जिंदा बची थी। अपने समय का यह सामूहिक नरसंहार बेहद चर्चित कांड रहा। तत्कालीन मुख्यमंत्री सुश्री मायावती को भी मौके पर आना पड़ा। पुलिस को कत्ल की कोई मकूल वजह नहीं मिली, तो शक शबनम पर ठहर गया। कवरेज के दौरान मुझे आज भी याद है शबनम का वह चेहरा जब वह रोने की नौटंकिया करके वह इंसाफ की गुहार कर रही थी कि सर! इंसाफ दिला दो। बहरहाल शबनम और उसका प्रेमी गिरफ्त में आ गए। ऐसा कोई शक या कमजोर सबूत नहीं कि कातिल दोनों नहीं थे लिहाजा एक साल बाद दोनों को फांसी की सजा सुना दी गई। लेकिन वह हाईकोर्ट चले गए थे। कोर्ट ने फैसला बरकरार रखा। अब अमरोहा जिला जज अशोक कुमार ने क्रिमिनल याचिका अपीलें निरस्त करके दोनों का डेथ वारंट जारी किया है। शबनम को देखकर नहीं लगता कि कोई लड़की अपनों के लिए इस कदर क्रूर भी हो सकती है। शबनम जेल में रहते प्रेमी के बच्चे की माँ भी बनी। उसके बेटे की परवरिश जेल में ही हो रही है। बेटियों पर गर्व के बीच ऐसी बेटी पर भला कोई कैसे गर्व करे। शबनम वाकई फांसी की हकदार है ताकि फिर कोई ऐसा न कर सके। 

बुधवार, मई 06, 2015

सलमान सजा, कानून सभी के लिए
-नितिन शर्मा ‘सबरंगी’
लंबी जद्दो
जहद के बाद हिट एंड रन मामले में आखिर दोषी पाए जाने के बाद बॉलीवुड स्टार सलमान खान के हक में अदालत ने 5 साल की सजा मुकर्रर कर दी। इसको लेकर बहस शुरू हो गई। वास्तव में अदालत सबूतों और गवाहों पर काम करती है नकि भावनाओं का कोई स्थान होता है। इंसाफ के प्रति लोगों की उम्मीदों का चिराग और रोशन हुआ है। सभी को कानून का सम्मान करना चाहिए। नेता, अभिनेता, आम आदमी कानून तो सभी के लिए बराबर है। यह ठीक है कि सलमान अभिनेता हैं, लोगों के दिलों में उनके लिए जगह हैं, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि उन्हें कुछ भी करने की आजादी हो या पुराने गुनाहों पर पर्दा डाल दिया जाए। सलमान चूंकि रॉल मॉडल हैं इसलिए उनकी जिम्मेदारी कानून का पालन करने की ज्यादा हो जाती है। अजीब तर्क दे रहे हैं लोग। कोई कहता है कि सलमान गरीब बच्चों की बहुत मदद करते हैं, उनका ख्याल रखते हैं। वह बहुत अच्छे हैं। भला इन सब बातों का केस से क्या मतलब। इस आधार पर क्या उन्हें छूट मिलनी चाहिए थी। सलमान जो भी करते हैं उसकी रकम लेते हैं। ऐसा सक्षम व्यक्ति यदि गरीब बच्चों की मदद करता है, तो यह बहुत अच्छा है। जो भी सक्षम हैं उन्हें ऐसा करना चाहिए। फैसले से गायक अभिजीत बौखला गए। उन्होंने गरीबों की तुलना कुत्तों से करके शर्मनाक बयान दे दिया। उन्होंने कहा कि ‘कुत्ता अगर रोड़ पर सोएगा तो कुत्ते की मौत मरेगा। रोड गरीबों के बाप की नहीं है......’ उनका आशय यह कि गरीबों को फुटपाथ पर नहीं सोना चाहिए। हैरानी है उनकी संवेदनहीन सोच पर। जाहिर है कड़ाके की ठंड या जून की गर्मी में कोई खुशी से फुटपाथ पर नहीं सोता। सलमान को भी किसने कहा कि वह शराब पीकर कार चलाएं और सड़क की जगह फुटपाथ पर चढ़ा दें। इन सब बातों के मायने इसलिए नहीं हैं क्योंकि अदालत ने अपना काम किया है। चर्चा इस पर नहीं कि सलमान को सजा हो गई बल्कि चर्चा इस पर हो कि फैसले में देरी क्यों हुई? उन्हें जिस तरह सजा के बाद अन्तरिम जमानत चंद घंटों में मिल गई वह गरीबों के मामले में क्यों नहीं होता? तारीफ करनी चाहिए पुलिस के उन कारिंदों की जिन्होंने रसूख को नजरंदाज करके अपना काम ईमानदारी से किया। यदि उन्होंने ईमानदारी नहीं बरती होती, तो यकीनन इतनी सजा भी नहीं होती। अपनी कार्यप्रणाली को अक्सर आलोचनाओं की शिकार होने वाली पुलिस इस मामले में अलग साबित हुई। कौन नहीं जानता कि रसूखदार किस तरह कानून का तमाशा बनाकर उसे कठपुलती बनाने की सोच के राजा होते हैं। वह खुद को कानून से बड़ा मानते हैं। कानून के रखवालों को चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सजा से उन लोगों को खुशी हुई है, जिन्होंने पीड़ा को सहा है। हां दुर्भावना या अन्य किसी विशेष कारण से सजा पर खुश होना शर्मनाक जरूर है।
अदालत का फैसला न सिर्फ एक नजीर है बल्कि उन लोगों के लिए एक सबक भी है जो शराब पीकर गाड़ी चलाना शान का विषय समझते हैं। सरकारी आंकड़ों पर ही गौर कीजिए भारत में सड़क दुर्घटनाओं की सबसे बड़ी वजह शराब है। नशे में वाहन चलाने को लेकर कानून तो है, लेकिन उसका गंभीरता से पालन नहीं होता और यदि पुलिस सख्ती करती है, तो वह अखरता है। लोग खुद ही इसका पालन नहीं करना चाहते। इस तरह सजाएं होंगी, तो लोगों में डर पैदा होगा। जो हुआ सलमान की गलती थी उन्हें गलती पर ही सजा हुई है। वह रोल मॉडल हैं। उन्हें तो अब खुद सामने आकर विज्ञापन करने चाहिए कि शराब पीकर वाहन न चलाएं, इससे दूसरों की जान को खतरा हो सकता है और खुद कानून के फंदे में फंस सकते हैं। वैसे भी हीरो से लोग जल्दी सीखते हैं।

शनिवार, अप्रैल 25, 2015

मौत पर ‘आप’ की शर्मनाक सियासत
-नितिन शर्मा ‘सबरंगी’
 दिल्ली के जंतर-मंतर पर आम आदमी पार्टी की रैली में सरेआम फांसी लगाने वाले गजेन्द्र की मौत एक मुद्दा बन गई है। कितनी अजीब बात है कि हजारों लोगों के सामने एक शख्स रफ्ता-रफ्ता भाषणबाजियों के बीच अपनी सांसों की डोर को तोड़कर मौत की चौखट पर चला जाता है ओर सब मौत का लाइव तमाशा देखते हैं। कथित ईमानदार पार्टी के नेता, कार्यकर्ता, पुलिस व लोकतंत्र का चौथा खंबा मीडिया भी मुस्तैदी से उस वक्त मौजूद था। इंसानियत की गिरावट का शायद यह सबसे निचला पायदान है या दूसरे शब्दोें में कोढ़ग्रस्त इंसानियत की हकीकत। क्योंकि गजेन्द्र के साथ इंसानियत का भी सरेआम जनाजा निकला। गजेन्द्र अब इस दुनिया में नहीं है। उसकी मौत एक बड़ा मुद्दा ओर सवाल है। राजनीति, संवेदनाओं के साथ ही वादों का सिलसिला भी चलता रहेगा, लेकिन उसके परिवार का दुःख शायद ही कम हो। 
तेजी से मुकाम हासिल करने वाली आम आदमी पार्टी ने प्रचार के बाद हजारों की भीड़ जुटाई। रैली का मकसद खुद को किसानों का सबसे बड़ा हितैषी घोषित करना था। विपक्षियों की नीतियों पर सवाल उठाना था। तीखे प्रहार करना था। पूर्व में कई पार्टियों से ताज्लुक रखकर एमएलए का चुनाव लड़ चुका गजेन्द्र भी इसमें शामिल हुआ। राजस्थान के दौसा जिले के नांगल झामरवाड़ा गांव में रहने वाला गजेन्द्र का परिवार आर्थिक सम्पन्न है। गांव में उसका रसूख था। उसकी हालत कृषि प्रधान देश के उन अन्नदाताओं जैसी कतई नहीं थी जो फसल बर्बादी पर खून के नीर बहाकर मुआवजे की आस लगाए हैं। वह रैली में खुद ही आया या बुलाया गया? यह अभी स्पष्ट नहीं है अलबत्ता उ
त्साही गजेन्द्र ‘आप’ का चुनाव चिन्ह् झाड़ू लेकर पेड़ पर चढ़ गया। उसके पास एक सफेद गमछा भी था। गजेन्द्र सभी के आकर्षण का केन्द्र बना रहा। उसको देखकर नहीं लगता था कि कुछ समय बाद वह शख्य लाश में तब्दील हो जायेगा। ऐसे उत्साहियों की भी कमी नहीं थी कि जो उसे देखकर इशारेबाजियां कर रहे थे। कार्यकर्ताओं से लेकर मंच पर बैठे दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल तक जानते थे कि पेड़ पर वह है। किसी ने उसे नीचे आने की सलाह तक नहीं दी। बाद में वह गमझा गले में डालने लगा तब भी खामोशी ओर फिर एक झटके में गजेन्द्र झूल गया। खबर मंच तक पहुंची, लेकिन राजनीति में इंसानियत की मौत हो चुकी थी। भाषणबाजी जारी नहीं। आरोप-प्रत्यारोप और किसानों के हितैषी होने के खोखले दावे। घटिया राजनीति का शायद यह गजेन्द्र की मौत जैसा लाइव सबूत था। एक इंसान की मौत भी दिलों को नहीं पिंघला सकी इससे अधिक शर्मनाक भला क्या हो सकता है। गजेन्द्र को उतारने की कोशिश की गई, तो वह नीचे गया। उसकी मौत हो चुकी थी। तसल्ली के लिए अस्पताल ले जाया गया। गजेन्द्र ने फांसी लगायी या उत्साह में गड़बड़ाए संतुलन से हादसे का शिकार हो गया यह जांच का विषय है क्योंकि सटीक उत्तर किसी के पास नहीं है। उसका चंद लाइनों वाला कथित सुसाइड नोट जिसमें मरने जैसी बात नहीं लिखी है उस हैंडराइटिंग पर परिजन ही सवाल उठा रहे हैं।
गजेन्द्र की मौत पूरे देश की सुर्खियां बन गई। पूरे देश ने ‘आप’ को जिम्मेदार ठहराया। मौत के बाद भी जारी रही उनकी भाषणबाजी को शर्मिंदा करने वाला बताया, लेकिन इस भूल को मानने को कोई तैयार नहीं था। आप नेता आशुतोष का शर्मनाक बायान देखिए- ‘अगली बार ऐसा होगा, तो मैं मुख्यमंत्री जी से कहूंगा कि वह पेड़ पर खुद चढ़े और उस आदमी को आत्महत्या करने से रोकें।’ जिस दल को जनता ने उम्मीदों से सत्ता दी हो क्या उससे इस तरह की संवेदनहीनता की उम्मीद की जा सकती है। गजेन्द्र की मौत की खबर पर उसके परिवार को विश्वास ही नहीं हुआ। गजेन्द्र के परिजन मौत के लिए केजरीवाल को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनका कहना है कि वह आप के कहने पर ही दिल्ली गया था। वह सवाल उठा रहे हैं कि यदि केजरीवाल का कोई अपना होता, तो क्या तब भी भाषणबाजी जारी रखते? माहौल खिलाफ हुआ, तो केजरीवाल 43 घंटे बाद सामने आये ओर मीडिया पर ठीकरा फोड़ते हुए कहा कि मीडिया मामले को तूल दे रहा है। उन्होंने माफी भी मांगी कि उनसे गलती हुई है। उनसे गलत हुई इतना समझने में भी एक मुख्यमंत्री को 43 घंटे लग गए। जिस बात को 10 साल का बच्चा भी समझ रहा था वही नहीं समझ पाए यह ओर भी आश्चर्य में डालने वाला है। उन्हें आपत्ति इस बात पर थी कि मीडिया गजेन्द्र की खबरें क्यों दिखा रहा है। यदि यही गलती किसी अन्य पार्टी में हुई होती, तो केजरीवाल के लिए स्थिति दूसरी होती तब वह मीडिया की बहुत सराहना करते। गजेन्द्र की मौत का दर्द यकीनन ओछी राजनीति से बहुत बड़ा है। उसके परिवार का सवाल जायज भी कि यदि आप का कोई मरा होता, तो क्या भाषण जारी रखते? राजनीति में क्या संवेदनाओं को इस तरह से सूली पर लटका दिया जाता है? सवाल उठाए जा रहे हैं कि केजरीवाल बहुत जल्दी भूल गए जब शपथ ग्रहण के दौरान उन्होंने गाकर कहा था कि ‘इंसान का इंसान से हो भाईचारा यही पैगाम हमारा।’ वह किस भाईचारे की बात कर रहे थे। चुनाव से पहले ये तो तार काटने बिजली के खंबें पर चढ़ गए थे, लेकिन अब चुनाव जीत चुके हैं इसलिए पेड़ पर नहीं गए।
जांच की आंच से बचने के लिए अरविंद केजरीवाल से लेकर उनके खास सहयोगी तक बयानबाजियों का पलटयोग कर रहे हैं पहले अरविंद केजरीवाल ने कहा कि मुझे दुःख है कि सबकुछ हमारे सामने हुआ। हमारे सामने वह पेड़ पर चढ़ा। मंच से हम कहते रहे कि बचा लीजिए पुलिस मेरे कंट्रोल में नहीं है, तो क्या हुआ भगवान के कंट्रोल में तो है। फिर वह पलट गए कि उन्होंने कुछ नहीं देखा। उनकी नीतियों की तरह बयान भी स्पष्ट नहीं हो पा रहे हैं। क्योंकि उनमें बदलाव पैदा हो रहा है। गजेन्द्र को अंदाजा नहीं था कि उसकी मौत इस तरह हो जायेगी। वह शायद भूल गया था कि राजनीति के शतरंज पर छोटे प्यादों को सबसे पहले दाव पर लगाया जाता है। अरविन्द केजरीवाल दो साल में कई बार आपनी गलतियों पर शर्मिंदा हो चुके हैं। वह माफी मांग लेते हैं, लेकिन अफसोस यह कि इसका अहसास उन्हें विलम्ब से ही होता है। उनके ठीक समय पर पश्चाताप न करने से शक उत्पन्न होता है उनकी माफिया रियल होती हैं या टैक्निकल? सोशल मीडिया पर भी आम आदमी पार्टी शिकार बन रही है। कॉमेंट यहां तक हैं कि ‘कॉमेडी, ड्रामा, फाईट ओर इमोशन ‘आप’ के पास सबकुछ है।’ 
मामला चाहे जो भी हो, आम आदमी पार्टी ने हर मामले में बहुत जल्दी प्रगति की है। ईमानदारी के उनके अपने खुद के दावे हैं, लेकिन आपसी फूट व जनता की नाराजगी नीतियों से लेकर वादों तक भी सवाल खड़े करती हैं। ‘मुफ्त’ के सपनों की चुनौती से भी वह जूझ रही है। जनतंत्र को चुनाव में वह उम्मीदों के जहाज पर सवार कर चुकी है। यह अच्छे संकेत नहीं हैं जब लोग दिए हुए चंदे को भी वापस मांगने लगें। गजेन्द्र अब कभी वापस नहीं आयेगा, लेकिन सियासत और जांच दोनों साथ-साथ चलेंगी। उसकी मौत शर्म भी है और सबक भी। सवाल अब भी वही है कि गजेन्द्र की मौत का आखिर जिम्मेदार कौन है? अकेले ‘आप’ ‘हम’ या ‘सब’? 

रविवार, मार्च 22, 2015

हुजूर! 42 कत्ल के कातिल भी तो होंगे?
- पीड़ितों के दर्द पर जमकर होती रही सियासत।
- हाशिमपुरा कांड में 28 साल बाद आया फैसला।
-नितिन शर्मा ‘सबरंगी’
1987 में मेरठ दंगे के दौरान हुए बहुचर्चित हाशिमपुरा कांड में 42 लोगों की मौत पर दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने सबसे पुराने पेंडिंग केस में फैसला देकर सभी 16 आरोपियों को बरी कर दिया। 3 आरोपियों की मौत फैसले से पहले ही हो गई। फैसला हैरानी व नाखुशी दे रहा है। अदालत के दहलीज के बाहर यह हैरानी जरूरी भी है क्योंकि मानवता को शर्मसार करने वाले कांड में 28 साल बाद आये फैसले में भी कोई दोषी नहीं मिला। सरकारी तंत्र
ओर पैरवी के नकारेपन का इससे बड़ा सुबूत भला ओर क्या होगा। सवाल यह कि कत्ल हुए तो कातिल भी तो होंगे, लेकिन अदालती फैसले सुबूतों ओर गवाहों
की रोशनी में आते हैं। कानून भावनाओं से नहीं चलता वरना मौत का मंजर देखने वाली आँखों में इंसाफ की तड़प जरूरी दिखती। मांओं ओर बेवाओं का दर्द भी दिखता। रोजी-रोटी का संकट, घर के चिरागों के बुझने से हुआ अंधेरा ओर दुआओं में सिर्फ इंसाफ मांगते बूढे माँ-बाप दिखते। हाँ राजनीति के बाजीगर ऐसे दर्द को वोटों के मुनाफे के लिए वक्त-वक्त पर जरूर समझते रहे।
22 मई, 1987 को हुए नरसंहार पर मैंने भी कई बार कवरेज की। पीड़ित परिवारों के दर्द को शब्दों में तरासता रहा। इस केस की पैरवी करने वाले मौलाना यामीन जो हर मुलाकात में मुझे दस्तावेजी सुबूतों से रू-ब-रू कराते थे। पोस्टमार्टम रिपोर्ट व फोटोग्राफ तक वह समेटे थे। इंसाफ की आस लिए इस दुनिया से रूखसत हो गए। दर्द से रू-ब-रू हुए लोग मुझसे भी पूछते थे तो मैं उनकी उम्मीदों को चिराग को रोशन करता था। 1987 के दंगों की शुरूआत शब्बेरात पर अनार चलाने के विवाद को लेकर हुई। हिन्दू-मुस्लिम आमने-सामने आ गए और हाहाकार मच गया। मजबूरन शहर कफ्रर्यू के हवाले कर दिया गया। आरोपित है कि पीएसी के जवान ट्रक में भरकर युवाओं को ले गए ओर मुरादनगर नहर पर ले जाकर गोलियों से भून दिया। उनकी लाशें नहर में फेंक दी गईं। उस्मान, जुल्फिकार समेत करीब दस लोग मुरादनगर से बचकर वापस भाग आये थे। उस्मान, जुल्फिकार व दो अन्य के पैरों में गोलियां लगी थीं। इस दंगे में जैनुद्दीन ने अपने दो जवान बेटों को खोया। दो बेटों की मौत का गम क्या होता है इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। जैनुद्दीन और उनकी पत्नी श्रीमती अमीना के चेहरों की खुशी हमेशा के लिये गुम हो चुकी है। ईद पर भले ही सारा जहां खुशियों में डूब जाये, लेकिन वह अपने दोनों बेटों को याद कर आंसू बहाते हैं। उनकी तरह अन्य का दर्द भी पत्थर को चीर देने वाला है। उन दिनों मेरठ के जिलाध्किारी राध्ेश्याम कौशिक व एसएसपी मैनेजर पाण्डेय थे जिन्हें बाद में हटा दिया गया था। केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी। देश की बागडोर दिवंगत राजीव गांधी के हाथों में थी।
सबसे बड़ा सवाल यह कि राज्य सरकारों ने क्या किया? सियासत करने वालों ने दंगा पीड़ितों के दर्द को खूब भुनाया। हाशिमपुरा व मलियाना कांड के बाद आजम खां, मुलायम सिंह यादव व शहाबुद्दीन जैसे ऐसे नेता रहे जो विपक्ष में रहकर गला फाड़कर चिल्लाते रहे और पीड़ितों को न्याय दिलाने के ताल ठोकते रहे परन्तु उनके दावे थोथे ही साबित हुए क्योंकि दावों के मुताबिक उन्होंने कुछ नहीं किया। स्थानीय नेता भी वक्ती तौर पर नब्ज छूते रहे ओर वोट पाते रहे। यह काम अब भी जारी रहेगा। सियासत शायद है ही ऐसी। पीड़ित परिवार कहते हैं- ‘नेताओं की स्थिति उन चील-कौओं की तरह है जो अपना शिकार देखकर ही मंडराते हैं और चतुराई से शिकार करके निकल जाते हैं।’ समाज के कथित ठेकेदार भी खामोश रह जाते हैं। मेरठ दंगे कवरेज करने वाले बीबीसी के पत्रकार कुर्बान अली आज भी खुलासा कर रहे हैं कि तब से लेकर अब तक राज्य सरकारों ने इसकी पैरवी नहीं की नतीजन आरोपी बरी हो गए। गाजियाबाद के तत्कालीन एसएसपी विभूति नारायण राय ने दबावों के बावजूद मुकदमें लिखाये थे। कुर्बान अली यह भी आरोप लगाते हैं कि तल्कालीन गृह राज्यमंत्री ओर कांग्रेसी नेता पी0 चिदंबरम के इशारे पर भी यह हुआ। जो भी हो पीड़ित उस इंसाफ से महरूम हैं जो वह चाहते थे ओर बहस होती रहेंगी।

मंगलवार, फ़रवरी 10, 2015

‘मुफ्त’ के सपनों की बड़ी चुनौती

-जनतंत्र उम्मीदों के जहाज पर सवार -जनता के तराजू में संतुलित होना जरूरी।

-नितिन शर्मा ‘सबरंगी’
दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की जीत को प्रचंड, अविश्वसनीय, अद्भुत या अप्रत्याशित कुछ भी नाम दीजिए, लेकिन जनतंत्र ने उम्मीदों से उन्हें अपने राज्य के मुखिया के रूप में चुन लिया। यकीनन यह एक लहर थी जो अचानक नहीं बल्कि तब आयी जब जनता की सही नब्ज को पकड़ा गया। उसके बताया गया कि ‘मै आप हूं, वह करूंगा जो आप चाहते हो।’ जनतंत्र सबसे बड़ी ताकत है इसलिए सत्ता के ताज के ख्वाहिशमंद को पहले उसके सामने झुकना पड़
ता है। जनता बड़ी उम्मीदों से वोटों का ताज देती है। बेचारगी के हालातों में उसका यही इकलौता हथियार होता है। जनतंत्र की ताकत को हासिल करने के लिये केजरीवाल ने तमाम आलोचनाओं, धरनों, बयानबाजियों, टकराव ही नहीं बल्कि थप्पड़ और काली स्याही का भी सामना किया। सभ्य
समाज व स्वस्थ लोकतंत्र में वार व काली स्याही जैसी हरकतें निदंनीय थीं। जनता की उम्मीदों को हद दर्जे तक जगाया गया। यह हुनर ही सही, लेकिन केजरीवाल ऐसे हुनर के बाजीगर हैं जो सबकुछ बदलने की बात कहकर जनता को सपनों के ऐसे लोक में ले गए, जहां सिर्फ खुशहाली, विकास और ‘मुफ्त’ का ताबीज नजर आया। सुहाने सपनों को हर कोई हकीकत में तब्दील होते देखना चाहता है। उसके दिल-ओ-दिमाग पर केजरीवाल काबिज हो गए। लोगों को अपना अक्स उनमें नजर आया। अपनी बातों से उन्होंने दिलों में जगह बनायी। अब केजरीवाल की सभी राहें खुली हैं। वह बंदिशों से आजाद हैं और काम करने का बेहतर से बेहतर मौका भी। जनता चाहेगी कि हर हाल में उसकी उम्मीदें पूरी हो। केजरीवाल के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है। कथनी-करनी के फर्क को भी मिटाना होगा। जनता तराजू लेकर बैठ गई है उसमें संतुलन बनाए रखना होगा।
जनता ने वोट रूपी मजबूत शर्त रखकर बताया कि उसे यह सब चाहिए। जनतंत्र अब उम्मीदों के जहाज पर सवार है। सच यह है कि जनता एक बार केजरीवाल को परखना चाहती है। देखना चाहती है कि उनके बीच का आम आदमी आखिर क्या करेगा। वह हौंसलों की भी कायल हो गई। पिछली बार 49 दिनों के बजाये कुछ महीनों बाद केजरीवाल ने इस्तीफा दिया होता, तो शायद आप के पास यह कहने को नहीं होता कि वह 49 दिनों के सीएम रहे। काम का ज्यादा मौका ही नहीं मिला। अब उनके पास वक्त और मौका दोनों हैं। जनता टकटकी लगाए देखती रहेगी, उनके हर काम पर नजर होगी। उम्मीदों पर यदि पानी फिरा, तो जनता तिलमिलाहट की शिकार होगी। वह करेगी कुछ नहीं बल्कि सही वक्त की प्रतिक्षा करेगी। आप ने यदि उसके सपने पूरे नहीं किये, तो आप वजूद को बचाये रखने की लड़ाई लड़ेगी। यह ज्यादा सोचने की बात नहीं जब जनता पुरानी पार्टियों को नकार सकती है, तो आप की उम्र उसके लिये कम ही है। जनता को जब अपने मताधिकार का एक मौका मिलता है, तो गलतफहमियों को दूर कर देती है। ताजा नतीजे इसकी मिसाल भी हैं। मुफ्त, छूट, ऑफर जैसे मंत्रों पर हर कोई विश्वास करता है। हम उम्मीदों के चिराग ज्यादा रोशन रखते हैं। सपने कहीं भी जग जाते हैं बस उन्हें जगाने वाले में हुनर चाहिए। अच्छा हो या बुरा हम सपने देखना नहीं छोड़ते। यदि केजरीवाल उसकी कसौटी पर खरे नहीं उतरते, तो यह कहने वाले भी कम नहीं होंगे कि नकारात्मक व सस्ती लोकप्रियता वाली राजनीति अधकचरे ज्ञान की तरह बेहद नुकसानदेह है। सब्र के बांध भी रह-रहकर टूटूंगे। केजरीवाल कहते हैं कि हमें अहंकार से बचना होगा। बातों, सोच और काम में तालमेल हुआ, तो यकीनन नया इतिहास होगा।