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मंगलवार, दिसंबर 09, 2014

काली कमाई का बड़ा कुबेर
-इंजीनियर की दौलत से हर कोई हैरान 
-20 साल में बनाया करोड़ों का साम्राज्य
यादव सिंह व उसकी आलीशान कोठी।
-नितिन शर्मा ‘सबरंगी’ 
नोएडा, ग्रेटर नोएडा व यमुना प्राधिकरण के सस्पेंड हो चुके चीफ इंजीनियर यादव सिंह का नाम आयकर के शिकंजे में आने के बाद अचानक राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गया। यह सुर्खियां उसे करोड़ों की काली कमाई की कलयुगी बाजीगरी के चलते मिली। आगरा के एक छोटे से गांव निकलकर वर्ष 1980 में अपनी नौकरी शुरू करने वाला मामूली इंजीनियर इतना बड़ा धनपति बन गया कि उसने कमाई के मामलों में बड़े-बड़ों को पछाड़ दिया। कुछ सालों में उसने देश-विदेश में इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर दिया कि हर कोई हैरानी से उसकी चर्चा करता है। राजनीति को सुरक्षा कवच बनाकर उसने बेशुमार दौलत कमायी। उसके जानकार बताते हैं कि वह सभी काम दौलत के तराजू में ही तौलता था। उसे शोहरत नहीं बल्कि दौलत व रसूख से लगाव था। करोड़ों रूपये उसकी कारों, घरों व लॉकरों में पड़े रहते थे। उसने इतना माल बटोरा कि खुद भी ठीक से संभाल नहीं पा रहा था। काली कमाई की ऐसी दिवानगी अक्सर यादव सिंह जैसे लोगों में देखने को मिलती रहती है। उसका यही माल और काली कमाई का कलयुगी शातिराना अंदाज हर किसी को चौंका रहा है, लेकिन उन लोगों के पास चौंकने जैसा कुछ नहीं है जो यादव के कारनामों को पहले से जानते थे।
पहुंचे हुए खिलाड़ी यादव सिंह का रसूख ही था कि बड़े अधिकारी और नेता तक उससे मिलने के लिये घंटों इंतजार करते थे। तरसते थे कि यादव की नजरें उन पर भी पड़ जायें। प्राधिकरणों के बड़े-छोटे कामों पर किसी सल्तनत के मुखिया की तरह वह नजर रखता था और उसकी मर्जी के बिना कोई काम नहीं किया जाता था। कईयों की नौकरियां उसके रहम-ओ-करम पर ही चलती थीं। नियुक्तियां उसके इशारों पर हुआ करती थीं। वह ऊपर से नीचे तक सभी को खुश रखने का गणित भी बखूबी जानता था। यूं भी यादव सिंह जैसे लोग अचानक तो अमीर नहीं बन जाते। दौरान-ए-जांच यह भी पता चला कि महकमें के लोगों को यादव अपनी निजी जिंदगी से दूर रखता था। अपनी कार पर सरकारी चालक नहीं रखता था। कोठियों में भी ऐसे लोगों को मिलने की इजाजत नहीं थी। करोड़ों रूपयों की शिफ्टिंग में निजी सुरक्षाकर्मियों का सहारा लिया जाता था। घर से लेकर कार्यालय तक जैसे उसकी अपनी हुकूमत थी। फंसने से बचने के लिये उसने पत्नी कुसुमलता को तलाक दिया, लेकिन एक साथ रहता रहा। उसके नाम 40 से ज्यादा कंपनियां खुलवा दीं। हजारों रूपये से शुरू हुई यह कंपनियां अचानक करोड़ों में पहुंच गई। यादव का बेटा सनी व बेटी करूणा व गरिमा भी कंपनियों को संभालते थे। नोएडा व आगरा के नंदपुरा जैसी जगहों पर बनी यादव की कोठियों की चमक-दमक उनका रसूख बयां करती हैं। 
यादव पर बहुत पहले ही कार्रवाई हो गई होती, लेकिन राजनीति के बाजीगर अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिये उसको बचाते रहे। वरना क्या यह संभव था कि यादव दलाली, कमीशनखोरी और हिस्सेदारियों में इतना निडर हो जाता। यह आरोप सच भी प्रतीत होता है क्योंकि उसके घोटालों की जांच सीबीसीआईडी के पास ढाई साल से लंबित है। दर्जनों शिकायतें धूल फांक रही हैं क्यों? इसका जवाब समझा जा सकता है। यूपी में नौकरशाही बदनामी की डगर पर तभी से है जब से राजनीति को अधिकारी कवच बनाकर इस्तेमाल करने लगे। प्रवर्तन निदेशालय, लोकायुक्त, बड़े महकमों, सीबीसीआईडी में जांच के नाम पर खेल के आरोप भी नए नहंी हैं। निलम्बन और बहाली का खेल भी खूब किया जाता है। ऐसे दर्जनों मास्टरमाइंड हैं जिनकी जांच लम्बित पड़ी हैं। भ्रष्टाचार में डूबे अधिकारी ऐसा हुनर जानते हैं कि अपने आकाओं को कैसे खुश रखा जाये। यूपी में भ्रष्टाचार की 200 से ज्यादा जांच अभी लटकी हुई हैं। पूर्व मुख्य न्यायाधीश काटजू की भ्रष्टाचार पर पूर्व में की गई यह टिप्पणी गौर करने लायक है कि ‘हर तरफ लूट मची है।’ यादव के पूर्व कारनामों को उजागर करने वाले बीजेपी सांसद किरीट सोमैया कहते हैं कि यादव की राह अब मुश्किल है। सराहना करनी चाहिए आयकर की टीम की जिसने ईमानदारी से अपना काम करके कायी कमायी का पर्दाफाश किया। यह काम होनहार पुलिस को दिया गया तो शायद सूचना पहले ही लीक हो जाती। यूं भी यादव जैसी मोटे मुर्गे कम मिला करते हैं। आयकर विभाग के अनुसार ‘यादव का पासपोर्ट जब्त कर लिया गया है। उनके घर व लॉकरों से डॉयरियां मिली हैं, उनकी बारीकी जांच भी की जा रही है।’ ऐसी डायरियों में कईयों की गर्दन फंस जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आईटी उनके सभी बैंक खातों को सीज कर चुका है। वैसे यदि अकेले यादव पर इतना माल मिला है, तो उसने चहेतों या अपने से बड़े अफसरान, नेताओं को कितना कमवाया होगा इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। कईयों की पोल खुल भी रही है। कालेधन का इंजीनियर झटपटा जरूर रहा हैं, लेकिन बेफिक्र भी हैं कि वह एक दिन अपने हिसाब से व्यवस्था को अनुकूल कर लेंगे। कितनी अजीब बात है कि उसे सिर्फ निलम्बित करने में भी कई दिन लग गए। लोग मानते हैं कि तय करना मुश्किल है कि यादव सिंह को भ्रष्ट मछली कहें या मगरमच्छ?

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