Translate

शनिवार, दिसंबर 18, 2010

पत्नी के टुकड़े करने वाला ये इंसान तो नहीं है....
-इंजीनियर बना सबसे बड़े क्रूरतम कत्ल का वारिस
-बेखौफ कहता है वह‘मार दिया,तो अब सजा दो’
-खूब चटक रही है पति-पत्नी के रिश्तों की बुनियाद

उस शख्स की उम्र 37 साल है। दिल्ली यूनिवर्सिटी का टॉपर है ओर पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर। बातचीत का अंदाज भी रईसी और पढ़े-लिखों वाला है, लेकिन दिल्ली से अमेरिका की नामी कंपनी,कलकत्ता व देहरादून तक का सफर कर चुके इस शख्स के दामन पर अपनी प्रेमिका से पत्नी बनी अनुपमा गुलाटी के खून के इतने दाग लगे हैं जिन्हें कानून के आर्यभट्ट भी नहीं मिटा सकते। हैवानियत व दरिंदगी की हर हद को उसने लांघा। किसी ने सोचा भी नहीं था कि पढ़ाई के बल पर ऊँचें ओहदे पर पहुंचा राजेश गुलाटी देश के सबसे बड़े क्रूरतम व सनसनीखेज मर्डर का वारिस बन जायेगा और इस बहस का पुख्ता सुबूत भी कि पति-पत्नी के रिश्ते की बुनियाद आधुनिकता की चकाचौंध में किस कदर चटक रही है। उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक ज्योति स्वरूप पांडे, आईजी राम सिंह मीना व एम.ए.गणपति तक हैरान हैं कि वह कभी इतने भयानक हत्याकांड से रू-ब-रू नहीं हुए। राजेश ने न सिर्फ अपनी पत्नी का कत्ल किया बल्कि उसके शव के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। दो महीने तक अपनी पत्नी की लाश को 350 लीटर व 20 हजार रूपये की कीमत वाले डीप फ्रीजर में रखकर सुकून की जिंदगी जीता रहा है और किसी को भी खबर नहीं हुई। कूल दिमाग से उसने जिस तरह घटनाक्रम को अंजाम दिया वह उसके अंदर की दरिंगदगी को दिखाने के लिये काफी है। पोस्टमार्टम में अनुपमा की आधी बॉडी से चिकित्सकों को खून की एक बूंद भी नहीं मिल सकी। दुर्भाग्य यह कि हत्याकांड देवभूमि में दशहरे की रात हुआ। इंजीनियर दशानन बन गया। यूं तो इस दिन बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व होता है,लेकिन उसने बुराई पर अच्छाई की जीत नहीं होने दी। जिस पत्नी का उसने मर्डर किया उससे उसने सात साल तक दिवानगी की हद तक प्रेम किया और फिर परिजनों की मर्जी के खिलाफ शादी। दो जुड़वा बच्चों का वह पिता भी बना जिनमें एक बेटा है ओर एक बेटी। बदनसीबी देखिए साढ़े चार साल के इन दो मासूमों को आज भी नहीं पता कि उनकी माँ इस दुनिया में नहीं है और पिता जेल जा चुका है। शायद जब पता लगे, तो हैवान के खाते में नफरत के सिवा कुछ न आये। अदालती आदेश पर इन बच्चों की परवरिश का जिम्मा फिलहाल मृतका अनुपमा गुलाटी के भाई सुजान प्रधान पर है। अपनी पत्रकारिता के सफर में बड़े-बड़े हत्याकांड मैं कवर करता रहा, लेकिन यकीन जानिए इतने क्रूरतम हत्याकांड से मैं खुद भी कभी बावस्ता हुआ। हत्यारोपी राजेश को अपने किये का जरा भी अफसोस नहीं है। बहुत ही शांत अंदाज में वह बात करते हुए कहता है-‘हां मैंने मार दिया,तो अब सजा दो। मुझे कोई अफसोस नहीं है क्योंकि मेरी जिंदगी खत्म हो चुकी है। घटना इस बहस को जन्म देने के लिये भी काफी है कि सात जन्मों का बंधन एक ही जन्म चल जाये, तो जीवन सफल हो जाये। रिश्ते कलंकित हो रहे हैं। प्यार भी छलावा बनकर नापाक हो रहा है। आये दिन परिवार बिखर रहे हैं। छोटा सा जीवन परिवार जोड़ने-तोड़ने में ही बीत जाता है। कहीं पति कत्ल कर रहा है,तो कहीं पत्नियां भी अपनी मांग का सिंदूर पतियों को कत्ल कराके पोंछ रही हैं। यकीनन यह सब सभ्य समाज में कोढ़ग्रस्त इंसानियत भर है। कत्ल का ये सिलसिला थम जायेगा इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता है,बशर्ते हम सुखद कल्पना तो कर ही सकते हैं कि रिश्तों का ऐसा भयानक अंजाम न हो। कामना ये भी बेगुनाह मासूम बच्चों का जीवन भी सुखमय हो। अनुपमा हत्याकांड की विस्तृत कहानी ‘मनोहर कहानियाँ’ के जनवरी,2011 अंक में।

कोई टिप्पणी नहीं: