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गुरुवार, अक्तूबर 29, 2009

सलाखों के पीछे मंडराती मौत.......

अंधे बहरों की बस्ती मे यहाँ कोन किसी की सुनता है, माहोल सुनेगा देखेगा जिस वक्त बजेंगी जंजीरें. मरहूम शायर हफीज मेरठी का यह शेर शायद आने वाले वक्त को याद करने के लिये मजबूर करता है. गाजियाबाद की डासना जेल मे हुई २३ करोड़ के घोटाले के आरोपी आसुतोष अस्थाना की मौत हमारे पूरे तंत्र पर एक बड़ा सवाल है. कितने ताज्जुब की बात है की २३ करोड़ के उस घोटाले के आरोपी की खामोसी से मौत हो जाती है जीसमे न्याए विभाग के 33 अफसर फंसे हो. सभी इस कड़वी हकीकत को जानते है की अस्थाना साजिश का शिकार हुए है. अरुशी कांड की तरह साजिश के सरताजों की इस मामले मे भी कोई कमी नहीं है. उनके पास रसूख है, ताकत है, धन और बल है. सवाल ये नहीं की कोन भ्रस्ट है? बल्कि सवाल तो ये है की कोन कितना बड़ा भ्रस्ट है? इन सरताजों को शायद ही शिकंजे में लिया जा सके? जेलों के हालत किसी से छिपे नहीं है. हमारी जेले कानून से भी बड़ी सजा देती है. सलाखों के पीछे कब किसकी मौत के परवाने पर दस्तखत हो जाये इस बात को कोई नहीं जनता. सत्ता के गलियारों की चांदनी रही कविता की हत्या के आरोपी रविंदर की मौत का राज भी इसी जेल मे दफ़न है. कमाल देखीये जेल के किसी अफसर पर कोई कारवाई तक नहीं हुई. साजिश के कंट्रोल रूम का दरवाजा शायद बहुत ऊपर तक खुल रहा है. पता नहीं ये सिलसिला कब तक जारी रहेगा? ख़ैर जाच की मालगाडी चल रही है.